जय जिनेन्द्र ,
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सूत्र विभाग
इच्छामि णं भंते का पाठ
(प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा )
इच्छामि णं भंते ! तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे देवसियं 🌸 पडिक्कमणं ठाएमि देवसिय 🏵️ णाण दंसण - चरित्ताचरित्त - तव - अइयार चिंतणत्थं ✨ करेमि काउस्सग्गं ॥
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🌸 जहाँ जहाँ ' देवसियं ' शब्द आवे वहां वहां देवसियं के स्थान पर रात्रिक प्रतिक्रमण में " राइयं ", पाक्षिक में ' देवसियं पक्खियं ', चातुर्मासिक में ' चाउम्मासियं ' और सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में " संवच्छरियं " शब्द बोलना चाहिए।
✨ पाठान्तर - चिंतवणत्थं
🏵️ जहाँ जहाँ ' देवसिय ' शब्द आवे वहां वहां "देवसिय " के स्थान पर रात्रिक प्रतिक्रमण में " राइय ", पाक्षिक में " देवसिय पक्खिय ", चातुर्मासिक में " चाठम्मासिय " और सांवत्सरिक में " संवच्छरिय " शब्द बोलना चाहिए।
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मूल शब्द - अर्थ
इच्छामि णं - मैं चाहता हूँ (णं वाक्य अलंकार में)
भंते ! - हे भगवन् (हे पूज्य !)
तुब्भेहिं - आपके द्वारा
अब्भणुण्णाए समाणे - आज्ञा मिलने पर
देवसियं - दिन सम्बन्धी
पडिक्कमणं - प्रतिक्रमण (आवश्यक) को
ठाएमि - करता हूँ
देवसिय - दिन सम्बन्धी
णाण - दंसण - ज्ञान-दर्शन (सम्यक्त्व)
चरित्ताचरित्त - चारित्राचारित्र (संयमासंयम) (श्रावक का देश चारित्र)
तव - तप के
अइयार - अतिचारों का (९९ अतिचारों का)
चिंतणत्थं - चिन्तन करने के लिए
करेमि - करता हूँ
काउस्सग्गं - कायोत्सर्ग को
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प्रश्नोत्तर
प्र. १ - प्रतिक्रमण की आज्ञा लेने का कौनसा पाठ है ?
उ - "इच्छामि णं भंते" का पाठ है ।
प्र. २ - इस पाठ में किसकी प्रतिज्ञा की जाती है ?
उ - प्रतिक्रमण करने की और ज्ञान दर्शन चारित्र में लगे अतिचारों का चिन्तन करने के लिए कायोत्सर्ग करने की प्रतिज्ञा की जाती है ।
प्र. ३ - " ज्ञान " शब्द की क्या परिभाषा है ?
उ - वस्तु के विशेष स्वरूप को जानना 'ज्ञान' कहलाता है ।
प्र. ४ - " दर्शन " शब्द का क्या अर्थ है ?
उ - जिन प्ररूपित नव तत्त्वों पर श्रद्धा करना दर्शन है ।
प्र. ५ - " चरित्ताचरित्त " का क्या अर्थ है ?
उ - देशव्रत अर्थात् श्रावक के व्रतों को चरित्ताचरित्त कहा है क्योंकि पापों का सर्वथा त्याग करना चारित्र कहलाता है । श्रावक के मिथ्यात्व का तो सर्वथा त्याग होता है और बाकी पापों का त्याग देश अर्थात् अंश रूप से होता है इसलिये इसे चारित्राचारित्र - संयमासंयम कहते हैं ।
प्र. ६ - तप किसे कहते हैं ?
उ - जिस क्रिया द्वारा आत्मा से संबद्ध कर्म तपाये जाते हैं। अर्थात् नष्ट होते हैं । जैसे अग्नि में तपने पर सोना निर्मल बन जाता है ।
प्र. ७ - अतिचार क्या है ?
उ - व्रतों में लगने वाले दोषों को अतिचार कहते है ।
प्र. ८ - कायोत्सर्ग किसे कहते हैं ?
उ - शरीर से ममत्व हटाकर एकाग्र चित्त से ध्यान करना कायोत्सर्ग है ।
प्र. ९ - अतिचार और अनाचार में क्या अन्तर है ?
उ - व्रत का एकांश भंग अतिचार और सर्वांश भंग अनाचार है। अर्थात् प्रत्याख्यान का स्मरण नहीं रहने पर या शंका से व्रत में जो दोष लगता है वह अतिचार है और व्रत तोड़ देना अनाचार है ।
प्र. १० - अतिचार का प्रायश्चित्त क्या है ?
उ - मंद अतिचार का प्रायश्चित्त हार्दिक पश्चात्ताप और तीव्र अतिचारों का प्रायश्चित्त नवकारसी आदि तप है ।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

1 टिप्पणियाँ
nice blog thanks
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