जय जिनेन्द्र ,
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इच्छामि ठामि का पाठ
इच्छामि ठामि 🌸 काउस्सग्गं 🏵️ जो मे देवसिओ ✨ अइयारो कओ, काइओ, वाइओ, माणसिओ, उस्सुत्तो, उम्मग्गो, अकप्पो, अकरणिज्जो, दुज्झाओ, दुव्विचिंतिओ, अणायारो, अणिच्छियव्वो, असावगपाउग्गो, णाणे तह दंसणे, चरित्ताचरित्ते, सुए, सामाइए, तिण्हं गुत्तीणं, चउण्हं कसायाणं, पंचण्हमणुव्वयाणं, तिण्हं गुणव्वयाणं, चउण्हं सिक्खावयाणं, बारसविहस्स सावगधम्मस्स जं खंडियं, जं विराहियं, तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥
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🌸हरिभद्रीयावश्यक पृष्ठ ७७८ में "ठाइउं" पाठ है । 🏵️"इच्छामि ठामि काउस्सग्गं" के स्थान पर चौथे आवश्यक में "इच्छामि पडिक्कमिउं" शब्द बोलना चाहिए ।
✨जहां जहां भी देवसिओ शब्द आवे उसके स्थान पर रात्रिक प्रतिक्रमण में "राइओ", पाक्षिक प्रतिक्रमण में "देवसिओ पक्खिओ", चातुर्मासिक प्रतिक्रमण में "चाउम्मासिओ" और सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में "संवच्छरिओ" पाठ बोलना चाहिये ।
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मूल शब्द - अर्थ
इच्छामि - मैं चाहता हूँ
ठामि (ठाइउं) - करना
काउस्सग्गं - कायोत्सर्ग
जो मे - (निम्न अतिचारों में से) मैंने जो कोई
देवसिओ - दिवस (दिन) सम्बन्धी
अइयारो - अतिचार
कओ - किया हो
काइओ - काया सम्बन्धी
वाइओ - वचन सम्बन्धी
माणसिओ - मन सम्बन्धी
उस्सुत्तो - वचन से उत्सूत्र (सूत्र विरुद्ध) कहा हो
उम्मग्गो - उन्मार्ग (जैन-मार्ग से विरुद्ध) कहा हो
अकप्पो - काया से अकल्पनीय कार्य किया हो
अकरणिजो - अकरणीय (नहीं करने योग्य) किया हो
दुज्झाओ - (मन से) आर्त्तध्यान रौद्र ध्यान ध्याया हो
दुव्विचिंतिओ - दुष्ट चिन्तन किया हो
अणायारो - न आचरने योग्य का आचरण किया हो
अणिच्छियव्वो - (मन से) अनिच्छनीय की इच्छा की हो
असावग पाउग्गो - श्रावक धर्म के विरुद्ध काम किया हो
णाणे तह दंसणे - ज्ञान तथा दर्शन में
चरित्ताचरित्ते - चारित्राचरित्र (श्रावक व्रत) में
सुए - श्रुत (ज्ञान) में
सामाइए - सामायिक में
तिहं गुत्तीर्ण - तीन गुप्तियों की
चउन्हं कसायाणं - चार कषायों के निषेधों की
पंचण्हमणुव्वयाणं - पांच अणुव्रतों की
तिन्हं गुणव्वयाणं - तीन गुणव्रतों की
चउन्हं सिक्खावयाणं - चार शिक्षा व्रतों की (इस प्रकार)
बारस्स-विहस्स - बारह प्रकार के
सावग-धम्मस्स - श्रावक धर्म की
जं खंडियं - जो देश से खण्डना की हो
जं विराहियं - जो सर्वथा विराधना की हो
तस्स मिच्छामि दुक्कडं - उसका मेरा पाप निष्फल हो
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प्रश्नोत्तर
प्र. १ - प्रतिक्रमण का सार पाठ कौनसा है ?
उ - प्रतिक्रमण का सार पाठ "इच्छामि ठामि" का पाठ है ।
प्र. २ - इसे सार पाठ क्यों कहा है ?
उ - इसमें ज्ञान, दर्शन, चारित्र की शुद्धि के लिए तीन गुप्ति, चार कषाय त्याग, पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षा व्रत रूप श्रावक धर्म में लगे हुए अतिचारों का मिच्छामि दुक्कडं दिया गया है एवं आवश्यक पाठों का सार होने से इसे प्रतिक्रमण का सार पाठ कहा है
प्र. ३ - अतिचार के मुख्य कितने प्रकार हैं ?
उ - तीन प्रकार हैं - १. कायिक २. वाचिक ३. मानसिक ।
प्र. ४ - पाठ में दिये गये अतिचार उक्त किन अतिचारों से सम्बन्धित हैं ।
उ - उस्सुत्तो और उम्मग्गो वचन सम्बन्धी, अकप्पो और अकरणिज्जो काया सम्बन्धी और आगे के अतिचार प्रायः मन सम्बन्धी हैं ।
प्र. ५ - श्रावक के कितने व्रत हैं ?
उ - श्रावक के बारह व्रत हैं - पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षा व्रत ।
प्र. ६ - अणुव्रत किसे कहते हैं ?
उ - महाव्रतों की अपेक्षा छोटे व्रतों को अणुव्रत कहते हैं। महाव्रतों में हिंसादि पापों का सम्पूर्ण त्याग होता है और अणुव्रतों में मर्यादित त्याग होता है ।
प्र. ७ - पांच अणुव्रत कौनसे हैं ?
उ - १. स्थूल (मोटी) हिंसा का त्याग २. स्थूल झूठ का त्याग ३. स्थूल चोरी का त्याग ४. स्वस्त्री सन्तोष और पर स्त्री सेवन का त्याग ५. इच्छा परिमाण अर्थात् परिग्रह का परिमाण करना ।
प्र. ८ - गुण व्रत किसे कहते हैं ?
उ - जो अणुव्रतों को गुण अर्थात लाभ पहुँचाते हैं, उन्हें गुण व्रत कहते हैं ।
प्र. ९ - किन व्रतों को गुण व्रत कहा है ?
उ - १. दिशा परिमाण व्रत २. उपभोग परिभोग परिमाण व्रत ३. अनर्थ दण्ड विरमण व्रत को गुण व्रत कहा है ।
प्र. १० - शिक्षा व्रत किसे कहते हैं ?
उ - कर्म क्षय की शिक्षा देने वाले व्रतों को या मोक्ष प्राप्ति के लिए अभ्यास कराने वाली क्रियाओं की शिक्षा देने वाले व्रतों को शिक्षा व्रत कहते हैं ।
प्र. ११ - कौन से व्रत शिक्षा व्रत हैं ?
उ - १. सामायिक व्रत २. देशावकाशिक व्रत ३. पौषध व्रत ४. अतिथि संविभाग व्रत ।
प्र. १२ - अकल्पनीय व अकरणीय में क्या अन्तर है ?
उ - श्रावकाचार के विरुद्ध आचरण करना "अकल्पनीय " है। तथा अयोग्य सावद्य आचरण करना "अकरणीय" है । इस प्रकार अकल्पनीय में अकरणीय का समावेश हो सकता है । पर अकल्पनीय का समावेश अकरणीय में नहीं होता ।
प्र. १३ - खण्डित और विराधित में क्या अन्तर है ?
उ - व्रत का एकांश भंग खंडित और सर्वांश भंग विराधित कहलाता है ।
प्र. १४ - "मिच्छामि दुक्कडं" का क्या अर्थ है ?
उ - द्रव्य भाव से नम्र बन कर, चारित्र की मर्यादा में स्थिर रह कर किये हुए पापों को उपशम भाव से दूर करता हूँ । एवं मेरा पाप निष्फल हो ।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।।

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