जय जिनेन्द्र ,

एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है । 

हमारे परम आराध्य

१. देव - हम जैन हैं । अर्हंत और सिद्ध भगवान् ही, हमारे परम् आराध्य देव हैं । वे वीतरागी, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी होते हैं । राग, द्वेष, मोह और अज्ञान का सर्वथा नाश करके वे देव हुए हैं । अहंत भगवन्तों ने जगत् के समस्त जीवों की रक्षा एवं दया के लिए उपदेश दिया कि –
         "सुखार्थियो ! यदि सुख चाहते हो तो किसी भी जीव को दुःख मत दो । छोटे बड़े समस्त जीवों को अपनी आत्मा के समान समझो । संयम में रहो । हिंसा, झूठ, चोरी, दुराचार, क्रोध, अभिमान, कपट, लोभ, लड़ाई झगड़ा मत करो । मन को वश में रखो । संतोष धारण करो और अपने विचार सदैव पवित्र और ऊंचे रखो ।"
          परमोपकारी प्रभु के उपदेश को हमें अपने जीवन में उतारना चाहिए । सदैव उनका ध्यान, स्मरण एवं स्तुति करनी चाहिए ।

२. गुरु – जिन्होंने समस्त पापों का सर्वथा त्याग कर दिया, संसारी संबंधों को छोड़ दिया, जिनका न कोई घर होता है और न स्थायी निवास होता है, जो अपने पास एक पैसा तक नहीं रखते, निर्दोष गोचरी से निर्वाह करते हैं, पैदल चलते हैं, अपने पास भगवान् की आज्ञानुसार संयम में उपयोगी मर्यादित वस्त्र, पात्र, शास्त्र, रजोहरण आदि के अतिरिक्त कुछ नहीं रखते और अपना सामान खुद उठाते हैं एवं जो शरीर और वस्त्र को सुशोभित नहीं रखते । अपना कोई भी सामान गृहस्थ के यहाँ नहीं रखते हैं।
            प्राणीमात्र की अहिंसा पालते हैं, अहिंसा का पालन करने के लिए वे मुंह पर मुखवस्त्रिका बाँधते हैं, ताकि मुँह से निकली हुई वायु से जीवों की हिंसा नहीं हो । रजोहरण भी वे अहिंसा का पूर्णरूपेण पालन करने के लिए ही अर्थात् जीवों की रक्षा के लिए रखते हैं। इंजिन, बिजली या बेटरी एवं हाथ से चलने वाले पंखे, रेडियो, ध्वनि प्रसारक यंत्र, टेप, वीडियो, केमरा आदि का भी उपयोग नहीं करते। दीपक, बल्ब, ट्यूब के प्रकाश का सहारा नहीं लेते। पुस्तकें छपवाना, स्थानक बनवाना आदि सावद्य कार्यों का उपदेश नहीं देते हैं । घड़ी एवं धातु की वस्तु नहीं रखते, न फ्लश (लेट्रिन) का उपयोग करते हैं ।
            मरते हुए प्राणी की रक्षा करने में धर्म मानते हैं । जो राजनैतिक, सामाजिक या आर्थिक सभी प्रकार की हलचल से परे रहते हैं । संयम, तप तथा स्वाध्याय, ध्यान आदि से अपनी आत्मा को उन्नत बनाते हैं । भव्य जीवों को हितोपदेश देते हैं। ऐसे सर्वत्यागी निर्ग्रंन्थ हमारे गुरु हैं ।

३. धर्म - जिनेश्वर भगवान् का बताया हुआ आचार धर्म है। यह अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह रूप है। पाप कर्मों का त्याग, कषाय विजय अर्थात् राग और द्वेष पर विजय पाना एवं देव, गुरु की भक्ति, ज्ञान, ध्यान, स्वाध्याय आदि से आत्मा को विशुद्ध और पवित्र करने वाले चारित्र का पालन करना धर्म है। वह श्रावक धर्म और मुनि धर्म ऐसे दो प्रकार का है। इसका पालन करके जीवन को अधिक से अधिक धर्ममय बनाना प्रत्येक प्राणी का कर्त्तव्य है ।

४. शास्त्र (आगम) - जिनेश्वर भगवान् की वाणी के अनुसार रचित शास्त्र ही हमारे लिए आधारभूत हैं, जो आचारांग आदि बत्तीस हैं । इनका और इनके अनुकूल साहित्य का पठन, पाठन, श्रवण, स्वाध्याय, चिंतन एवं मनन हमारा श्रुतधर्म है ।
        वे‌ ही शास्त्र परम सुख की प्राप्ति में सहायक होते हैं, जिनमें हिंसा, झूठ, दुराचार तथा क्रोधादि को त्यागने की और अहिंसा, संयम तथा तप अंगीकार करने की प्रेरणा की गई हो । जैन आगम, जीव को पाप का त्याग कर संयमी बनने की प्रेरणा देते हैं और सच्चे सुख का मार्ग बताते हैं । इसलिए इनका स्वाध्याय करना श्रुतधर्म है ।

                 ऐसे देव, गुरु, धर्म और शास्त्र पर दृढ़ विश्वासपूर्वक आराधन करके जीवन सफल बनाना हमारा कर्त्तव्य है ।



आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।