जय जिनेन्द्र ,

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श्रावकजी के पाँच अभिगम

अभिगम अर्थात् भगवान् के समवसरण में या साधु-साध्वी के उपाश्रय (स्थानक) में जाते समय पालने योग्य नियम । ये अभिगम पाँच हैं ।

सचित्त त्याग अचित्त रख, उत्तरासंग कर जोड़ ।
कर एकाग्र चित्त को, सब झंझटों को छोड़ ।

१. सचित्त का त्याग – देव गुरु के समीप जाते समय इलायची, दाख, बादाम, पान, फल, फूल, बीज, अनाज, हरा दतौन, शाक आदि सचित्त वनस्पति, कच्चा पानी, नमक, लालटेन, चालू टार्च, चालू सेल की घड़ी, मोबाईल फोन आदि साथ नहीं ले जाना चाहिए।

२. अचित्त का विवेक - दर्प - सूचक वस्तुएँ जैसे छत्र, चामर, जूते, लाठी, वाहन, शस्त्र आदि एक तरफ रखकर एवं वस्त्र व्यवस्थित कर देव-गुरु को वन्दना करना । भाईयों को सामायिक के लिए महासतीजी व बहिनों के सामने वस्त्र नहीं बदलना चाहिए, किन्तु एक तरफ जाकर वस्त्र बदलना चाहिए ।

३. उत्तरासंग 🌸 - मुंहपत्ति बांधना या रूमाल मुंह के ऊपर रखना। देव गुरु के समक्ष खुले मुंह से नहीं बोलना चाहिए।

४. अञ्जलीकरण – जहाँ से देव, गुरु दिखलाई दें वहीं से अञ्जली (जोड़े हुए दोनों हाथ) ललाट से लगाकर विनय पूर्वक वन्दना करना चाहिए ।

५. मन की एकाग्रता - गृहकार्य के प्रपंच या पापकार्यों से मन हटाकर देव-गुरु जो फरमाते हैं उसे एकाग्रता पूर्वक सुनना चाहिए।

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       🌸 श्री भगवती सूत्र के शतक २ उद्देशक ५ में पांच अभिगम इसी प्रकार बताये हैं लेकिन भगवती सूत्र के शतक ९ उद्देशक ३३ में तीसरा अभिगम "विनय से शरीर को अवनत करना (झुकना)" श्राविकाओं के लिये बताया है।

आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।