जय जिनेन्द्र ,
एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ।
कथा-काव्य
पाप से डरो
एक गाँव में क्षीरकदम्ब नाम के कलाचार्य रहते थे । उनके पास वसु, पर्वत और नारद, ये तीन बालक पढ़ते थे । वसु राजनगर का राजकुमार था । पर्वत, कलाचार्य का पुत्र था और नारद एक ब्राह्मण का पुत्र था । कलाचार्य उनको बड़े प्रेम से पढ़ाते थे । एक दिन कई साधु आपस में बातचीत कर रहे थे कि इन बालकों में से, दो तो नरकगामी हैं और एक स्वर्गगामी है।
कलाचार्य ने यह सब सुन लिया और उनकी परीक्षा के लिए आटे के तीन मुर्गे बनाए जो देखने में असली मुर्गे जैसे थे और तीनों शिष्यों को बुलाकर कहा – 'लो, एक-एक मुर्गा ले जाओ और जहाँ कोई न देखता हो वहाँ इन्हें ले जाकर मार डालो ।'
वसु और पर्वत ने एक अन्धेरी गुफा में जाकर अपने अपने मुर्गों को मार डाला, परन्तु नारद घूमकर जैसे गया, वैसे ही लौट आया ।
कलाचार्य ने उनसे पूछा - 'क्यों, मार आए ?' पर्वत ने कहा- 'जी हाँ ' । पर नारद ने कहा वसु और 'जी नहीं ।' कलाचार्य ने नारद से पूछा – 'तुमने मेरा आदेश क्यों नहीं माना ?'
नारद – मैंने तो आपके आदेश का ही पालन किया है । मुझे तो ऐसा कोई स्थान नहीं मिला, जहाँ कोई भी नहीं देखता हो ।
कलाचार्य – तुम कहीं एकांत में नहीं गए होगे ?
नारद – मैं बहुत दूर घने जंगल में चला गया था और ज्यों ही उसे मारने लगा, त्यों ही मुझे याद आया कि और कोई नहीं तो सर्वज्ञ सर्वदर्शी परमात्मा तो देख ही रहे हैं। बस, मैंने सोच लिया कि अब तो कोई स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ कोई न देखता हो । कलाचार्य ने जान लिया कि वसु और पर्वत की दुर्गति होगी और नारद की सद्गति ।
शिक्षाएं :—
१. आज्ञा देने वाले की बात को व्यवस्थित समझ कर ही आज्ञा का पालन करना चाहिये।
२. पापकार्य करते हुए व्यक्ति एकांत चाहता है पर पाप से होने वाले कर्म बंध से वह नहीं बच सकता।
३. हम दुनिया को धोखा दे सकते हैं, पर सर्वज्ञों को नहीं उनके ज्ञान से कोई वस्तु, भाव छिपे नहीं रह सकते हैं।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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