जय जिनेन्द्र ,

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सामायिक लेने की विधि

               सर्वप्रथम स्थान मुखवस्त्रिका, पूंजनी, आसन आदि की प्रतिलेखना करना फिर यतना पूर्वक स्थान पूँजकर आसन बिछाना । मुख पर मुखवस्त्रिका बाँधना और सामायिक के योग्य वेष धारण करना । बाद में आसन छोड़कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके (पद्मासन आदि से बैठकर या जिनमुद्रा में खड़े होकर) नमस्कार सूत्र ( नवकार) तीन बार बोलना । फिर सम्यक्त्व सूत्र (अरहंतो महदेवो) बोलना फिर गुरु गुण स्मरण सूत्र (पंचिंदिय संवरणी) बोलना  इसके बाद गुरु वन्दन सूत्र (तिक्खुत्तो) से तीन बार वन्दन करके शासनपति (महावीर स्वामी) या अपने धर्माचार्यजी की आज्ञा लेकर "आलोचना सूत्र" (इच्छाकारेणं) बोलना इसके बाद उत्तरीकरण सूत्र ( तस्स उत्तरी) बोलकर कायोत्सर्ग करना कायोत्सर्ग में "आलोचना सूत्र" का मन में ध्यान करना । पाठ के अन्त में "तस्स मिच्छामि दुक्कडं" के स्थान पर "तस्स आलोउं" कहना और "णमो अरहंताणं" कहकर कायोत्सर्ग पारना । बाद में कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ और इसके बाद चतुर्विंशतिस्तव सूत्र (लोगस्स) बोलना, फिर प्रतिज्ञा सूत्र (करेमि भंते) का पाठ तीन बार बोलकर सामायिक व्रत की प्रतिज्ञा ग्रहण करना"करेमि भंते" पाठ में जहाँ "जाव नियमं" शब्द आता है वहाँ जितनी सामायिक लेनी हो, उतने मुहूर्त्त उपरान्त बोलकर आगे का पाठ समाप्त करना । तत्पश्चात् नीचे बैठ कर बायाँ घुटना खड़ा कर दो बार "णमोत्थुणं" का पाठ बोलना। दूसरी बार "णमोत्थुणं" का पाठ बोलने के समय "ठाणं संपत्ताणं" के स्थान पर "ठाणं संपाविउकामाणं " बोलना 

              सामायिक में नया ज्ञान सीखना, सीखे हुए ज्ञान, थोकड़ा, बोल आदि चितारना, स्वाध्याय करना, परमात्मा के स्तवन, प्रार्थना, स्तोत्र, स्तुति आदि बोलना, माला फेरना आदि ज्ञान-ध्यान करना। आशय यह है कि सामायिक का काल प्रमाद रहित होकर ज्ञान ध्यान, चिन्तन, मनन में बिताना चाहिए। संत मुनिराज विराजते हों, तो उनकी ओर पीठ करके नहीं बैठना चाहिए। स्वाध्याय, व्याख्यान या उपदेश दे रहे हों, तो उसमें उपयोग रखना चाहिए । सामायिक में विकारजनक उपकरण नहीं रखना चाहिए । सामायिक में वर्जनीय दोषों का सेवन नहीं करना चाहिए।



आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।