जय जिनेन्द्र ,

एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है । 


सामायिक में वर्जनीय बत्तीस दोष
मन के दस दोष

अविवेग जसोकित्ती, लाभत्थी गव्व-भय नियाणत्थी ।
संसय रोस अविणउ, अबहुमाण ए दोसा भणियव्वा 

१. अविवेक - विवेक बिना सामायिक करे तो "अविवेक" दोष । 

२. यशकीर्ति - यश-कीर्ति के लिए सामायिक करे तो "यशकीर्ति" दोष 

३. लाभार्थ - धनादि के लाभ की इच्छा से सामायिक करे तो "लाभवाँछा" अर्थात् 'लाभार्थ' दोष । 

४. गर्व - गर्व (अहंकार) सहित सामायिक करे तो "गर्व" दोष 

५. भय - राज्यादि के अपराध के भय से सामायिक करे तो "भय" दोष ।

६. निदान - सामायिक में नियाणा (निदान) करे तो "निदान" दोष ।
 
७. संशय - फल में संदेह रख कर सामायिक करे तो "संशय" दोष । 

८. रोष - सामायिक में क्रोध, मान, माया, लोभ करे तो " रोष" दोष ।

९. अविनय - विनयपूर्वक सामायिक नहीं करे तथा सामायिक में देव, गुरु, धर्म की अविनय-आशातना करे तो "अविनय" दोष।

१०. अबहुमान - बहुमान भक्तिभावपूर्वक सामायिक नहीं कर के बेगारी के समान सामायिक करे तो "अबहुमान" दोष ।



आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।