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सामायिक के प्रश्नोत्तर
प्रश्न १ - सामायिक कहाँ करनी चाहिये ?
उत्तर - सामायिक निरवद्य स्थान में करें। जहाँ सन्त विराजते हों वहाँ या उनके अभाव में जहाँ श्रावक आदि धर्म क्रिया करते हों। अपने घर में सामायिक करनी पड़े, तो एकांत स्थान में सामायिक करें।
प्रश्न २ - सामायिक का वेश कैसा हो तथा उपकरण कैसे रखें ?
उत्तर - निरवद्य स्थान को देख कर या पूँज कर सादा आसन बिछावें। सांसारिक वेश कुरता, टोपी, पगड़ी, पेन्ट, पाजामा, बनियान, स्वेटर, हाथ पैर के मौजे, रंगीन लूँगी (तहमत) आदि उतारें। यदि धोती पहनी हुई हो तो एक लांग खुली कर दें या सफेद चोल पट्टक पहिन कर सफेद दुपट्टा ओढ़ें (पेट छाती आदि अंग खुले न रहें)। मुखवस्त्रिका का प्रतिलेखन करें और उसमें डोरा लगाकर मुँह पर बाँधे। धार्मिक पुस्तकें, माला, पूँजनी आदि पास रखें।
प्रश्न ३- सामायिक के उपकरण क्या हैं ?
उत्तर - मुखवस्त्रिका, आसन, दुपट्टा, चोलपट्टक, पूँजनी, माला, धार्मिक पुस्तकें आदि ।
प्रश्न ४- मुखवस्विका का क्या परिमाण है ?
उत्तर- मुखवस्विका अपने हाथ के अंगुल से १६ अंगुल चौड़े तथा २१ अंगुल लम्बे श्वेत कपड़े की होनी चाहिये। इसके आठ पट कर के बीच में डोरा रख कर मुँह पर बाँधनी चाहिये।
प्रश्न ५ - इसे मुखवस्त्रिका क्यों कहते हैं ?
उत्तर- यह मुख पर बाँधी जाती है इसलिये इसे मुखवस्त्रिका कहते हैं।
प्रश्न ६ - मुखवस्त्रिका मुँह पर बाँधने से क्या लाभ हैं?
उत्तर- १. खुले मुंह की भाषा को भगवती सूत्र शतक १६ उद्देशक २ में सावध भाषा बताई है, सावद्य भाषा बोलने का सामायिक में त्याग होता है। २. मुख पर मुखवस्त्रिका नहीं बाँधने से बोलते समय जो वेगपूर्वक वायु निकलती है, उससे बाहरी वायु के जीव टकरा कर मर जाते हैं। मुखवस्त्रिका बाँधने से उनकी रक्षा हो जाती है। ३.सामायिक में हमारी प्रवृत्ति आंशिक रूप से साधु जैसी होती है, साधु मुखवास्त्रिका बांधते हैं, अतः हमें भी मुखवस्त्रिका बांधना चाहिये। ४. जीव मुँह में प्रवेश नहीं करते हैं। ५. मुँह का थूक दूसरे पर या पुस्तक पर नहीं पड़ता है। ६. यह धार्मिकता का चिह्न है । इत्यादि अनेक लाभ हैं, इसलिये मुँहपत्ति बाँधना आवश्यक है ।
प्रश्न ७ - अतिक्रम किसे कहते हैं ?
उत्तर- व्रत का उल्लंघन करने के संकल्प को अतिक्रम कहते हैं ।
प्रश्न ८ - व्यतिक्रम किसे कहते हैं ?
उत्तर- व्रत का उल्लंघन करने के लिये कायिक व्यापार प्रारम्भ करना व्यतिक्रम है।
प्रश्न ९ - अतिचार किसे कहते हैं ?
उत्तर- व्रत को भंग करने की सामग्री इकट्ठी करना और भंग के निकट पहुँच जाना, उसे अतिचार कहते हैं |
प्रश्न १० अनाचार किसे कहते हैं ?
उत्तर- व्रत को सर्वथा भंग करना अनाचार कहलाता है।
प्रश्न ११ - सामायिक करने से क्या लाभ है?
उत्तर १. समभाव की प्राप्ति होती है, २. अठारह पाप छूटते हैं, ३. दो घड़ी साधु जैसा जीवन बीतता है, ४. जीवों की दया और रक्षा की भावना बढ़ती है और दृढ़ बनती है, ५. सामायिक करने से जिनवाणी सुनने, पढने और समझने का अवसर मिलता है, इत्यादि बहुत लाभ हैं ।
प्रश्न १२ - नमस्कार सूत्र आदि पाठों के ऊपर १, २, ३ आदि क्रमांक लगाने का कारण क्या है ?
उत्तर - "प्रवचन सारोद्धार" ग्रन्थ के पहले द्वार की ७८ वीं गाथा में नमस्कार सूत्र आदि पाठों की सम्पदाएँ बताई गई हैं। “सम्पदा" का अर्थ विश्राम लेने का स्थान किया गया है अर्थात् पाठों को बोलते हुए बीच में कितने विश्राम लेना चाहिये। इसी को लक्ष्य में रख कर ये क्रमांक लगाये गये हैं। अलग अलग पाठों में अलग अलग संपदायें (विश्राम स्थल) बताई गई हैं। १, २, ३ आदि अंक इन्हीं सम्पदाओं को सूचित करते हैं।
प्रश्न १३ -नमस्कार सूत्र, सम्यक्त्व सूत्र, गुरु गुण स्मरण, चतुर्विंशतिस्तव सूत्र की सम्पदा कैसे समझनी चाहिये ?
उत्तर - नमस्कार सूत्र, सम्यक्त्व सूत्र, गुरु गुण स्मरण सूत्र चतुर्विंशतिस्तव सूत्र चारों गाथा रूप (पद्य) हैं । इनके एक चरण की एक सम्पदा होती है। अतः इनके क्रमांक प्रत्येक चरण के ऊपर लगाये गये हैं।
प्रश्न १४ - सामायिक का मुहूर्त आदि समय कब से प्रारम्भ होता है ?
उत्तर - सामायिक का समय प्रतिज्ञा सूत्र (करेमि भंते) बोलने के बाद से गिनना चाहिये ।
प्रश्न १५ - क्या सामायिक का समय आने के पूर्व सामायिक पारने की विधि की जा सकती है ? उत्तर सामायिक का समय आने के पूर्व सामायिक पारने की विधि नहीं की जा सकती है। सामायिक का कालमान पूर्ण हो जाने पर ही सामायिक पारने की विधि करनी चाहिये |
प्रश्न १६ - मुखवस्त्रिका पर मुँह का थूक लग जाने से क्या सम्मूर्च्छिम मनुष्य पैदा नहीं होते हैं ?
उत्तर- प्रथम बात तो यह है कि सावधानी पूर्वक बोला जाय तो मुँहपत्ति पर थूक लगता ही नहीं है। यदि कदाचित् लग जाय तो भी सम्मूर्च्छिम मनुष्य उत्पन्न नहीं होते हैं। क्योंकि सम्मूर्च्छिम मनुष्य उत्पन्न होने के पन्नवणा सूत्र में जो चौदह स्थान बतलाये हैं उनमें "थूक" नहीं गिनाया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि थूक में सम्मूर्च्छिम जीव (मनुष्य) उत्पन्न नहीं होते हैं।
प्रश्न १७ - सामायिक लेते समय प्रतिज्ञा सूत्र (करेमि भंते का पाठ) कितनी बार बोलना चाहिये ( एक बार या तीन बार )?
उत्तर- सामायिक ग्रहण करने का पाठ (करेमि भंते) एक बार की अपेक्षा तीन बार बोलना उचित रहता है। प्रतिज्ञा करते समय हमें अधिक सावधान और जागरूक रहने के लिए प्रतिज्ञ सूत्र तीन बार दोहराना चाहिये। मनोविज्ञान का भी नियम है कि जब तक प्रतिज्ञा वाक्य को दूसरे वाक्यों से पृथक् महत्त्व नहीं दिया जाता तब तक वह मन पर दृढ़ संस्कार उत्पन्न नहीं कर सकता। प्रश्न हो सकता है कि प्रतिज्ञा सूत्र एक बार बोलने पर भी संकल्प दृढ़ हो सकता है। फिर तीन बार की आवश्यकता क्यों है? इसका समाधान यह है कि तिक्खुत्तो के पाठ से एक बार वन्दना करने पर भी वन्दना हो जाती है। फिर भी पूर्ण विनय एवं अत्यधिक श्रद्धा व्यक्त करने के लिए वन्दना का पाठ तीन बार बोला जाता है। इसी प्रकार सामायिक का प्रतिज्ञा पाठ तीन बार दुहराना प्रतिज्ञा के प्रति अत्यधिक श्रद्धा और दृढ़ता के लिए आवश्यक है।
प्रश्न १८ - क्या इसके लिए कोई प्रमाण भी उपलब्ध है ?
उत्तर - व्यवहार-सूत्र के चौथे उद्देशक के भाष्य में बतलाया गया है -
"सामाइयं तिगुणमट्ठगहणं च " (गाथा ३०९)
इसकी टीका करते हुए आचार्य मलयगिरि लिखते हैं कि -
“त्रिगुणं त्रीन् वारान् सामायिकमुच्चारयति । "
अर्थात् सामायिक का प्रतिज्ञा पाठ तीन बार उच्चारण करना चाहिए। इसी प्रकार निशीथ चूर्णि में भी स्पष्ट वर्णन दिया गया है कि -
"सेहो सामाइयं तिक्खुत्तो कड्ढइ ।"
इस प्रकार प्राचीन भाष्यकारों एवं टीकाकारों के मत से भी सामायिक का प्रतिज्ञा पाठ तीन बार उच्चारण करना उचित है। अतः प्रतिज्ञा सूत्र तीन बार बोलना उचित रहता है।
प्रश्न १९ सामायिक लेते समय प्रतिज्ञा सूत्र (करेमि भंते ) को तीन बार बोलने की विधि (परम्परा) प्राप्त होती है ?
उत्तर- सन्मति ज्ञान पीठ आगरा से प्रकाशित कवि श्री अमरचन्दजी महाराज द्वारा लिखित "सामायिक सूत्र" नामक पुस्तक के परिशिष्ट १ में "सामायिक लेने की विधि" में प्रतिज्ञा सूत्र को तीन बार बोलने का उल्लेख किया है।
श्री उमेशमुनि जी म० "अणु" द्वारा सम्पादित श्री जैन प्रिंटिंग प्रेस सैलाना में मुद्रित (विक्रम संवत् २०१७) “सामायिक आवश्यक सूत्र" के पृष्ठ ९ पर भी प्रतिज्ञा सूत्र को तीन बार बोलने की विधि बताई गई है।
प्रश्न २० - गुरुजनों से सामायिक की प्रतिज्ञा ग्रहण करते समय प्रतिज्ञा सूत्र को तीन बार कैसे बोला जाता है ?
उत्तर - गुरुजनों से प्रतिज्ञा को ग्रहण करके स्वयं को पुनः दो बार प्रतिज्ञा सूत्र को उच्चारण करना चाहिये ।
प्रश्न २१ - पहले से ग्रहण की हुई सामायिक में और सामायिक मिलाते हुए भी प्रतिज्ञा सूत्र को क्या तीन बार बोलना चाहिये ?
उत्तर - पहली बार सामायिक ग्रहण करते समय प्रतिज्ञा सूत्र को तीन बार बोला हुआ होने से सामायिक का कालमान बढ़ाते हुए पुन: तीन बार बोलने की आवश्यकता नहीं होती है।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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