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भावार्थ - श्रावक के बारह व्रतों में से नववाँ व्रत सामायिक है। उसके पाँच अतिचार हैं। वे जानने योग्य हैं, परन्तु आचरण करने योग्य नहीं हैं। जैसे कि -
१. सामायिक के समय मन में बुरे विचार किये हों।
२. कठोर या पापजनक वचन बोले हों।
३. अयतनापूर्वक शरीर से चलना, फिरना, हाथ-पाँव फैलाना, संकोचना आदि क्रियाएँ की हों ।
४. सामायिक करने का काल याद न रखा हो।
५. अल्पकाल तक या अनवस्थित रूप से जैसे-तैसे सामायिक की हों।
इन पाँच अतिचारों से होने वाला मेरा पाप निष्फल हो ।
सामायिक का सम्यक् प्रकार काया से स्पर्श न किया हो, उसका पालन न किया हो, अतिचार टाल कर उसकी
शुद्धि न की हो (शोभा से युक्त न की हो ) उसे पूर्ण न किया हो, कीर्तन न किया हो, उसकी आराधना न की हो एवं जिनेश्वर की आज्ञानुसार उसका पालन न किया हो, तो उससे होने वाला मेरा पाप निष्फल हो।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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