जय जिनेन्द्र ,
एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है । 


मूल - अर्थ

एयस्स - इस

नवमस्स - नववाँ

सामाइयवयस्स - सामायिक व्रत के

पंच - पाँच

अइयारा - अतिचार

जाणियव्वा - जानने योग्य हैं किन्तु

न समायरियव्वा - आचरण करने योग्य नहीं हैं।

तं जहा - वे इस प्रकार हैं

मणदुप्पणिहाणे - मन में बुरे विचार उत्पन्न होना

वयदुप्पणिहाणे - कठोर या पाप-जनक वचन बोलना

कायदुप्पणिहाणे - बिना देखे पृथ्वी पर बैठना उठना आदि

सामाइयस्स - सामायिक करने का काल

सइ अकरणया - भूल जाना

सामाइयस्स अणवट्ठियस्स करणया - सामायिक का समय पूर्ण होने से पहले ही सामायिक पार लेना या अनवस्थित रूप से सामायिक करना

तस्स - उससे होने वाला

मिच्छा - मिथ्या (निष्फल) हो

मि - मेरा

दुक्कडं - पाप

सामाइयं - सामायिक का

सम्मं - सम्यक् प्रकार

काएणं - काया से

न फासियं - स्पर्श न किया हो

न पालियं - पालन न किया हो

न तीरियं - पूर्ण न किया हो

न किट्टियं - कीर्तन न किया हो

न सोहियं - शुद्धतापूर्वक न की हो

न आराहियं - आराधन न किया हो

आणाए - एवं जिनेश्वर की आज्ञानुसार

अणुपालियं न भवइ - पालन न किया हो

मिच्छा - मिथ्या हो

तस्स - उससे होने वाला

मि - मेरा

दुक्कडं - पाप




आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।