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मूल - अर्थ
एयस्स - इस
नवमस्स - नववाँ
सामाइयवयस्स - सामायिक व्रत के
पंच - पाँच
अइयारा - अतिचार
जाणियव्वा - जानने योग्य हैं किन्तु
न समायरियव्वा - आचरण करने योग्य नहीं हैं।
तं जहा - वे इस प्रकार हैं
मणदुप्पणिहाणे - मन में बुरे विचार उत्पन्न होना
वयदुप्पणिहाणे - कठोर या पाप-जनक वचन बोलना
कायदुप्पणिहाणे - बिना देखे पृथ्वी पर बैठना उठना आदि
सामाइयस्स - सामायिक करने का काल
सइ अकरणया - भूल जाना
सामाइयस्स अणवट्ठियस्स करणया - सामायिक का समय पूर्ण होने से पहले ही सामायिक पार लेना या अनवस्थित रूप से सामायिक करना
तस्स - उससे होने वाला
मिच्छा - मिथ्या (निष्फल) हो
मि - मेरा
दुक्कडं - पाप
सामाइयं - सामायिक का
सम्मं - सम्यक् प्रकार
काएणं - काया से
न फासियं - स्पर्श न किया हो
न पालियं - पालन न किया हो
न तीरियं - पूर्ण न किया हो
न किट्टियं - कीर्तन न किया हो
न सोहियं - शुद्धतापूर्वक न की हो
न आराहियं - आराधन न किया हो
आणाए - एवं जिनेश्वर की आज्ञानुसार
अणुपालियं न भवइ - पालन न किया हो
मिच्छा - मिथ्या हो
तस्स - उससे होने वाला
मि - मेरा
दुक्कडं - पाप
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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