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सामायिक पारने का पाठ
एयस्स नवमस्स सामाइयवयस्स पंच अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा-मणदुप्पणिहाणे, वयदुप्पणिहाणे, कायदुप्पणिहाणे, सामाइयस्स सइ अकरणया, सामाइयस्स अणवट्ठियस्स करणया तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
(हरिभद्रीयावश्यक पृष्ठ ८३१)
सामाइयं सम्मं काएणं न फासियं, न पालियं, न तीरियं, न किट्टियं, न सोहियं, न आराहियं, आणाए अणुपालियं न भवइ तस्स मिच्छामि दुक्कडं।
सामायिक में दस मन के, दस वचन के, बारह काया के इन बत्तीस दोषों में से कोई दोष लगा हो, तो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
सामायिक में स्त्रीकथा🌸,भक्त (भोजन) कथा, देशकथा, राजकथा इन चार कथाओं में से कोई कथा की हो, तो तस्स मिछामि दुक्कडं ।
सामायिक में आहारसंज्ञा, भयसंज्ञा, मैथुनसंज्ञा, परिग्रहसंज्ञा इन चार संज्ञाओं में से कोई संज्ञा की हो, तो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
सामायिक में अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार जानते अनजानते मन-वचन-काया से कोई दोष लगा हो, तो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
सामायिक व्रत विधिपूर्वक लिया, विधि से पूर्ण किया, विधि में कोई अविधि हुई हो, तो तस्स मिच्छामि दुक्कडं।
सामायिक का पाठ बोलने में काना, मात्रा, अनुस्वार, पद, अक्षर, ह्रस्व, दीर्घ, न्यूनाधिक, विपरीत पढ़ने में आया हो, तो अनन्त सिद्ध केवली भगवान् की साक्षी से तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
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पाठान्तर :🌸श्राविकाएँ "स्वीकथा" के स्थान पर "पुरुषकथा" कहें ।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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