प्रणिपात सूत्र (णमोत्थुणं का पाठ) भावार्थ & प्रश्नोत्तर

जय जिनेन्द्र ,
एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है । 

                 भावार्थ - अर्हंत (अरिहन्त) भगवान् को मेरा नमस्कार हो, जो धर्म की आदि करने वाले हैं, साधु-साध्वी श्रावक और श्राविका रूप चार तीर्थों की स्थापना करने वाले हैं। दूसरे के उपदेश के बिना ही जो बोध प्राप्त कर चुके हैं। सभी पुरुषों में उत्तम हैं, पुरुषों में सिंह के समान निर्भय हैं, पुरुषों में कमल के समान हैं, जैसे कमल जल से अलिप्त रहता है उसी प्रकार तीर्थंकर भगवान् संसार के स्नेह रूपी जल से अलिप्त रहते हैं । पुरुषों में प्रधान गंधहस्ती के समान हैं, लोक में उत्तम हैं, लोक के नाथ हैं, लोक के हितकारक हैं, लोक में प्रदीप के समान प्रकाश करने वाले हैं, लोक में अज्ञान रूप अंधकार का नाश करने वाले हैं । छह काय जीवों को अभयदान देने वाले हैं, अज्ञान से अंधे बने हुए लोगों को ज्ञान रूप चक्षु को देने वाले हैं, मार्ग-भ्रष्ट को मार्ग दिखाने वाले, संयम या ज्ञान रूप जीवन के देने वाले हैं, शरणागत को शरण देने वाले हैं, सम्यक्त्व प्रदान करने वाले हैं, धर्म का दान करने वाले हैं, जिज्ञासुओं को धर्म का उपदेश करने वाले, धर्म के नायक हैं, धर्म के सारथी (संचालक) हैं, चार गति का अंत करने वाले, धर्म रूपी चक्र को धारण करने वाले अतएव प्रधान धर्म-चक्रवर्ती रूप हैं, संसार रूप समुद्र में द्वीप के समान, रक्षक रूप, शरण रूप, गति रूप एव आधारभूत है। सभी पदार्थों के स्वरूप को प्रकाशित करने वाले श्रेष्ठ ज्ञान-दर्शन अर्थात् केवलज्ञान-केवलदर्शन को धारण करने वाले हैं, छद्म रूप आवरण से मुक्त हैं, स्वयं राग-द्वेष को जीतने वाले और दूसरों को जिताने वाले हैं, स्वयं संसार के पार पहुँच चुके हैं और दूसरों को भी उसके पार पहुँचाने वाले हैं, स्वयं ज्ञान पाये हुए हैं और दूसरों को भी ज्ञान प्राप्त कराने वाले हैं, स्वयं मुक्त हैं और दूसरों को भी मुक्ति प्राप्त कराने वाले हैं, सर्वज्ञ हैं, सर्वदर्शी हैं तथा कल्याणकारी, उपद्रव रहित, अचल (स्थिर), रोग रहित, अनंत, अक्षय, बाधा पीड़ा रहित और पुनरागमन रहित अर्थात् जहाँ जाकर वापस लौटना न पड़े ऐसे सिद्धि गति नामक स्थान को प्राप्त हैं अथवा प्राप्त होने वाले हैं । ऐसे सभी प्रकार के भयों को अर्थात् संसार के सातों भयों को जीतने वाले जिनेश्वरों को नमस्कार हो ।


प्रश्नोत्तर

प्रश्न १ - प्रणिपात सूत्र का दूसरा नाम क्या है ? 
उत्तर  - इस पाठ का दूसरा नाम णमोत्थुणं या शक्रस्तव भी है ।

प्रश्न २ - इसे शक्रस्तव का पाठ क्यों कहते हैं ?
उत्तर - पहले देवलोक के इन्द्र शक्र इसी पाठ से अहंतों व सिद्धों को नमस्कार करते हैं ।

प्रश्न ३ - लोगस्स और णमोत्थुणं में क्या अन्तर है ?
उत्तर - लोगस्स में नाम-स्मरण, नाम-स्तुति, नमस्कार और प्रार्थना है । णमोत्थुणं में गुण-स्मरण, गुण-स्तुति और नमस्कार है। 

प्रश्न ४ - सभी प्रकार की भक्ति में कौन सी भक्ति सर्वश्रेष्ठ है ?
उत्तर - गुण- स्मरण एवं आज्ञा पालन रूप भक्ति सर्वश्रेष्ठ है ।

प्रश्न ५ - पहले णमोत्थुणं और दूसरे णमोत्थुणं में क्या अंतर है ? 
उत्तर - पहले णमोत्थुणं के अंत में "ठाणं संपत्ताणं" और दूसरे णमोत्थुणं के अंत में "ठाणं संपाविउकामाणं" पाठ बोला जाता है ।

प्रश्न ६ - पहला णमोत्थुणं किसको दिया जाता है ? 
उत्तर - पहला णमोत्थुणं सिद्ध भगवन्तों को दिया जाता है। 

प्रश्न ७ - दूसरा णमोत्थुणं किसे दिया जाता है ? 
उत्तर - दूसरा णमोत्थुणं अर्हन्त भगवन्तों को दिया जाता है ।


आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।