एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ।
मूल - अर्थ
अरहंताणं भगवंताणं - अर्हंत भगवान् को
णमोत्थुणं - नमस्कार हो
आइगराणं - धर्म की आदि (प्रारम्भ) करने वाले
तित्थयराणं - धर्म-तीर्थ की स्थापना करने वाले
सयंसंबुद्धाणं - अपने आप ही बोध पाये हुए
पुरिसुत्तमाणं - पुरुषों में उत्तम (श्रेष्ठ)
पुरिससीहाणं - पुरुषों में सिंह के समान
पुरिसवर-पुंडरीयाणं - पुरुषों में श्रेष्ठ पुंडरीक कमल के समान
पुरिसवर-गंधहत्थीणं - पुरुषों में प्रधान गंधहस्ती के समान
लोगुत्तमाणं - लोक में उत्तम
लोगणाहाणं - लोक के नाथ
लोगहियाणं - लोक का हित करने वाले
लोगपईवाणं - लोक के लिये दीपक के समान
लोगपज्जोयगराणं - लोक में उद्योत करने वाले
अभयदयाणं - अभय देने वाले
चक्खुदयाणं - ज्ञान रूपी नेत्र देने वाले
मग्गदयाणं - धर्म मार्ग के दाता
सरणदयाणं - शरण देने वाले
जीवदयाणं - संयम या ज्ञान रूपी जीवन देने वाले
बोहिदयाणं - बोधि अर्थात् सम्यक्त्व देने वाले
धम्मदयाणं - धर्म के दाता
धम्मदेसयाणं - धर्म के उपदेशक
धम्मनायगाणं - धर्म के नायक
धम्मसारहीणं - धर्म के सारथी
धम्मवर चाउरंत चक्कवट्टीणं - चार गति का अन्त करने वाले (धर्म रूप चक्र को धारण करने वाले अतएव ) प्रधान धर्म चक्रवर्ती रूप
दीव - संसार-समुद्र में द्वीप के समान
ताण - रक्षक रूप
सरण - शरणभूत
गइ - गति रूप
पइट्ठाणं - संसार रूपी कुएँ में गिरते हुए प्राणियों के लिये आधार रूप
अप्पडिहय-वर-नाण -दसण धराणं - अप्रतिहत (बाधा रहित) तथा श्रेष्ठ अर्थात् पूर्ण ज्ञान-दर्शन के धारक
विअट्टछउमाणं - छद्मस्थता से रहित
जिणाणं - स्वयं राग-द्वेष को जीतने वाले
जावयाणं - दूसरों को जिताने वाले
तिण्णाणं - स्वयं संसार से तिरे हुए
तारयाणं - दूसरों को तारने वाले
बुद्धाणं - स्वयं बोध पाये हुए
बोहयाणं - दूसरों को बोध प्राप्त कराने वाले
मुत्ताणं - स्वयं कर्म बन्धन से छूटे हुए
मोयगाणं - दूसरों को छुड़ाने वाले
सव्वण्णूणं - सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाले)
सव्वदरिसीणं - सर्वदर्शी (सब कुछ देखने वाले)
सिवं - निरुपद्रव, कल्याण स्वरूप
अयलं - स्थिर
अरुअं - रोग रहित
अणंतं - अनंत (अन्त रहित)
अक्खयं - क्षय-रहित
अव्वाबाहं - बाधा पीड़ा रहित
अपुणरावित्ति - पुनरागमन रहित ऐसे
सिद्धिगइनामधेयं - सिद्धि गति नामक
ठाणं - स्थान को
संपत्ताणं + - प्राप्त हुए
जियभयाणं - भय को जीतने वाले
जिणाणं - जिनेश्वर भगवान् को
णमो - नमस्कार हो
ठाणं - स्थान को (सिद्धि)
संपाविउकामाणं ^ - प्राप्त करने की इच्छा वाले
___________________________________________________________________________________
+ दूसरे णमोत्थुणं में 'ठाणं संपत्ताणं' के स्थान पर 'ठाणं संपाविउकामाणं' बोलना चाहिये ।
^ ठाणं संपाविउकामाणं - सिद्धिगति रूप स्थान को पाने की इच्छा वाले अर्हंत (अरिहन्त) भगवान् को ।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
पूरा ब्लॉग पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । अगर आपको यह ब्लॉग अच्छा लगा हो तो नीचे comment में हमें जरूर बताएं । आप हमें FOLLOW एवं E-MAI द्वारा सब्सक्राइब भी कर सकते हैं ताकि आपके पास यह ज्ञान निरंतर आता रहे।हमें जरूर बताएं ।
जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

0 टिप्पणियाँ
Please donot enter any Spam Link in the Comment Box