जय जिनेन्द्र ,
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९. प्रणिपात सूत्र (णमोत्थुणं का पाठ)

णमोत्थुणं अरहंताणं+ भगवंताणं, आइगराणं, तित्थयराणं सयंसंबुद्धाणं, पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवर-पुंडरीयाणं पुरिसवर-गंधहत्थीणं, लोगुत्तमाणं, लोगणाहाणं, लोगहियाणं, लोगपईवाणं, लोगपज्जोयगराणं, अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गदयाणं,सरणदयाणं, जीवदयाणं, बोहिदयाणं, धम्मदयाणं, धम्मदेसयाणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवर चाउरंत चक्कवट्टीणं, दीव-ताण-सरणगइ-पइट्ठाणं x, अप्पडिहय-वर-नाण-दंसण धराणं, विअट्ट-छउमाणं, जिणाणं, जावयाणं, तिण्णाणं, तारयाणं, बुद्धाणं, बोहयाणं, मुत्ताणं, मोयगाणं, सव्वण्णूणं, सव्वदरिसीणं सिव- मयल मरु अ मणंत-मक्खय-मव्वाबाह मपुणरावित्ति सिद्धिगइ-नामधेयं ठाणं * संपत्ताणं, णमो जिणाणं जियभयाणं ॥ 
                                  (औपपातिक सूत्र १२)

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पाठान्तर : + अरिहंताणं
            : x दीवो-ताणं सरणगइ-पइट्ठाणं
* दूसरी बार णमोत्थुणं बोलते समय "ठाणं संपत्ताणं" के बदले 'ठाणं संपाविउकामाणं" बोलना चाहिये ।


आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।