८. प्रतिज्ञा सूत्र (करेमि भंते का पाठ)
करेमि भंते ! सामायं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि जाव नियमं➕ पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा तस्स भंते ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
(हरिभद्रीयावश्यक पृष्ठ ४५४)
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➕ यहाँ जितने मुहूर्त (सामायिक) लेनी हो, 'जाव नियमं ' के आगे उतने मुहूर्त उपरान्त बोल कर आगे का पाठ बोलना चाहिए ।
मूल - अर्थ
भंते ! - हे भगवन् !
सामाइयं - समभाव रूप सामायिक को
करेमि - मैं ग्रहण करता हूं
सावज्जं - सावद्य (पाप सहित)
जोगं - योगों का व्यापार (कार्य) का
पच्चक्खामि - प्रत्याख्यान (त्याग) करता हूँ
जाव - जब तक
नियमं - इस नियम का
पज्जुवासामि - मैं सेवन करता रहूँ तब तक
दुविहं - दो करण से
तिविहेणं - तीन योग से अर्थात्
मणसा - मन से
वयसा - वचन से
कायसा - काया (शरीर) से
न करेमि - सावद्य योग का सेवन नहीं करूँगा
न कारवेमि - दूसरे से नहीं कराऊँगा
भंते - हे भगवन् !
तस्स - उससे (पहले के पाप से)
पडिक्कमामि - मैं निवृत्त होता हूँ
निंदामि - उस पाप की आत्म साक्षी से निंदा करता हूँ
गरिहामि - गुरु साक्षी से गर्हा (निन्दा) करता हूँ
अप्पाणं - अपनी आत्मा को उस पाप व्यापार से
वोसिरामि - हटाता हूँ, पृथक् करता हूँ
भावार्थ - मैं सामायिक (समभाव की प्राप्ति) व्रत ग्रहण करता हूँ (राग द्वेष का अभाव और ज्ञान दर्शन चारित्र का लाभ ही सामायिक है) मैं पापजनक व्यापारों का त्याग करता हूँ । जब तक मैं इस नियम का पालन करता रहूँ, तब तक मन वचन और काया - इन तीनों योगों द्वारा पाप कार्य स्वयं नहीं करूँगा और न दूसरे से कराऊँगा । हे स्वामिन् ! पूर्वकृत पाप से मैं निवृत्त होता हूँ। हृदय से मैं उसे बुरा समझता हूँ और गुरु के सामने उसकी निन्दा करता हूँ । इस प्रकार मैं अपनी आत्मा को पाप-क्रिया से निवृत्त करता हूँ।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न १ - सामायिक किसे कहते हैं ?
उत्तर - जिसके द्वारा समभाव की प्राप्ति हो, उसे सामायिक कहते हैं ।
प्रश्न २ - सामायिक में किसका त्याग किया जाता है ?
उत्तर - सामायिक में सावद्य योगों का त्याग किया जाता है।
प्रश्न ३- सावद्य योग किसे कहते हैं ?
उत्तर-अठारह पाप की प्रवृत्ति को सावद्य योग कहते हैं ।
प्रश्न ४ - मुहूर्त किसे कहते हैं ?
उत्तर - ४८ (48) मिनिट का एक मुहूर्त होता है ।
प्रश्न ५ करण किसे कहते हैं ?
उत्तर - करना, करवाना और अनुमोदन करना, ये तीन करण हैं।
प्रश्न ६ - योग किसे कहते हैं ?
उत्तर - करण के साधन को योग कहते हैं । मन, वचन और काया ये तीन योग हैं।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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