जय जिनेन्द्र ,
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६. उत्तरीकरण-सूत्र (तस्स उत्तरी का पाठ)

तस्स उत्तरीकरणेणं, पायच्छित्तकरणेणं, विसोहीकरणेणं, विसल्लीकरणेणं, पावाणं कम्माणं णिग्घायणट्ठाए ठामि काउस्सग्गं, अण्णत्थ ऊससिएणं, णीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं, उड्डुएणं, वायनिसग्गेणं, भमलीए, पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालेहिं, सुहुमेहिं दिट्ठिसंचालेहिं, एवमाइएहिं आगारेहिं, अभग्गो अविराहिओ, हुज्ज मे काउस्सग्गो, जाव अरहंताणं🌸 भगवंताणं, णमोक्कारेणं💠 न पारेमि, ताव कायं ठाणेणं, मोणेणं, झाणेणं, अप्पाणं वोसिरामि ॥
                                    (हरिभद्रीयावश्यक पृष्ठ ७७२)
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पाठान्तर :- 🌸 अरिहंताणं ,💠णमुक्कारेणं


मूल - अर्थ
तस्स - उस (पापयुक्त आत्मा) को
उत्तरीकरणेणं - श्रेष्ठ (उत्कृष्ट) बनाने के लिये
पायच्छित्तकरणेणं - प्रायश्चित्त करने के लिये
विसोहीकरणेणं - विशेष शुद्ध करने के लिये
विसल्लीकरणेणं - शल्यों का त्याग करने के लिये
पावाणं - पाप
कम्माणं - कर्मों का
णिग्घायणट्ठाए - नाश करने के लिये
काउस्सग्गं - कायोत्सर्ग (शरीर के व्यापारों का त्याग)
ठामि - करता हूँ 
ऊससिएणं - उच्छ्वास अर्थात् ऊँचा श्वास लेना
णीससिएणं - नि:श्वास अर्थात् नीचा श्वासनिकालना
खासिएणं - खाँसी आना
छीएणं - छींक आना
जंभाइएणं - उबासी आना
उड्डुएणं - डकार आना
वायनिसग्गेणं - अधोवायु निकलना
भमलीए - चक्कर आना
पित्तमुच्छाए - पित्त विकार की मूर्च्छा आना
सुहुमेहिं - सूक्ष्म (थोड़ा-सा)
अंगसंचालेहिं - अंग का संचार (हिलना)
सुहुमेहिं - सूक्ष्म (थोड़ा-सा)
खेलसंचालेहिं - कफ का संचार 
सुहुमेहिं - सूक्ष्म (थोड़ा-सा) 
दिट्ठिसंचालेहिं - दृष्टि का हिलना
एवं - इस प्रकार
आइएहिं - इत्यादि
आगारेहिं - आगारों के 
अण्णत्थ - सिवाय
मे - मेरा
काउस्सग्गो - कायोत्सर्ग
अभग्गो - अभग्न
अविराहिओ - अविराधित (अखण्डित)
हुज्ज - हो
जाव - जब तक
अरहंताणं - अर्हंत (अरिहंत) 
भगवंताणं - भगवान् को
णमोक्कारेणं - नमस्कार करके
न पारेमि - न पारूँ
ताव - तब तक
ठाणेणं - काया से स्थिर रह कर
मोणेणं - वचन से मौन रह कर
झाणेणं - मन से शुभ ध्यान धर कर
अप्पाणं - अपने
कायं - शरीर को
वोसिरामि - वोसिराता हूँ अर्थात् अपने शरीर की ममता को त्यागता हूँ।



आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।