जय जिनेन्द्र ,
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उत्तरीकरण-सूत्र (तस्स उत्तरी का पाठ)

                भावार्थ - ईर्यापथिकी क्रिया से आत्मा पर लगा हुआ मैल "मिच्छामि दुक्कडं " से कुछ अंशों में दूर हुआ । उसे अधिक शुद्ध और निर्मल बना कर पापकर्मों का नाश करने के लिये कायोत्सर्ग करता हूँ । आत्मा को संस्कारित और प्रशस्त बनाने के लिये पापों का प्रायश्चित्त आवश्यक है । प्रायश्चित्त के लिये आत्मा शुद्ध होनी चाहिये एवं आत्मशुद्धि के लिए शल्यों (माया, निदान और मिथ्यादर्शन) का दूर होना जरूरी है । इसलिये मैं शल्य दूर करके आत्मा को शुद्ध करता हूँ फिर प्रायश्चित्त द्वारा आत्मा को प्रशस्त बनाकर पाप कर्मों का नाश करने के लिये कायोत्सर्ग करता हूँ।
                कायोत्सर्ग (काउस्सग्ग) शरीर के व्यापारों का त्याग है । इस प्रकार का सर्वथा त्याग सम्भव नहीं है । इसलिये काउस्सग्ग में आगार रखे जाते हैं, वे आगार इस प्रकार हैं - 
श्वास का लेना और निकालना, खाँसना, छींकना, जंभाई आना, डकार आना, अपानवायु का निकलना, चक्कर आना, पित्त प्रकोप से मूर्च्छा आ जाना, अंगों का सूक्ष्म हलन-चलन, कफ का सूक्ष्म संचार, दृष्टि का सूक्ष्म संचालन आदि🏵️ इनके होते रहने पर भी काउस्सग्ग नहीं टूटता, परन्तु इनके सिवाय अन्य स्वाधीन क्रियाओं का मेरे त्याग है । अपवाद स्वरूप इन क्रियाओं के सिवाय अन्य कोई भी क्रिया मुझसे न हो और इनसे मेरा काउस्सग्ग सर्वथा अभग्न और अखण्डित रहे । यही मेरी अभिलाषा है ।"णमो अरहंताणं " शब्द द्वारा अर्हंत (अरिहंत) भगवान् को नमस्कार करके काउस्सग्ग को पूर्ण न करूँ, तब तक शरीर से निश्चल बन कर के, वचन से मौन रह कर और मन से शुभ ध्यान धर कर सभी अशुभ व्यापारों का त्याग करता हूँ। 
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🏵️ आदि शब्द से नीचे लिखे हुए चार आगार और समझने चाहिये -
१. आग के उपद्रव से दूसरे स्थान पर जाना । 
२. चूहे आदि को मारने के लिये बिल्ली झपटती हो या किसी पंचेन्द्रिय जीव का छेदन भेदन होता हो तो उनके रक्षार्थ प्रयत्न करना । 
३. डकैती पड़ने या राजा आदि के सताने से स्थान बदलना ।
४. सिंह आदि के भय से सांप आदि विषैले जन्तु के डंक से या दिवार आदि गिर पड़ने की शंका से दूसरे स्थान को जाना । इन चार आगारों से मेरा कायोत्सर्ग अभग्न और अखण्डित रहे। 
(हरिभद्रीयावश्यक कायोत्सर्गाध्ययन। पृष्ठ ७८३)


प्रश्नोत्तर

प्रश्न १ - उत्तरीकरण-सूत्र का दूसरा नाम क्या है ?
उत्तर - तस्स उत्तरी का पाठ ।

प्रश्न २ - इसे उत्तरीकरण का पाठ क्यों कहते हैं ?
उत्तर - इससे आत्मा को विशेष उत्कृष्ट बनाने के लिये कायोत्सर्ग की प्रतिज्ञा की जाती है ।

प्रश्न ३ - तस्स उत्तरी का पाठ कब बोला जाता है ?
उत्तर - किसी भी प्रकार के कायोत्सर्ग से पहले तस्स उत्तरी का पाठ बोला जाता है ।

प्रश्न ४ - तस्स उत्तरी का पाठ क्यों बोला जाता है ?
उत्तर - आने जाने आदि की क्रिया से आत्मा पर लगा हुआ कर्म मैल मिच्छामि दुक्कडं से कुछ अंशों में दूर होता है । उसे अधिक शुद्ध और निर्मल बनाने के लिये, प्रायश्चित्त करने के लिये, पापकर्मों का नाश करने के लिये कायोत्सर्ग (शरीर की हलन चलन आदि क्रिया का त्याग) किया जाता है । शरीर की आवश्यक क्रिया जिन्हें रोक पाना संभव नहीं होता है उन क्रियाओं का आगार (छूट) रखने के लिये यह पाठ प्रत्येक कायोत्सर्ग से पूर्व बोला जाता है ।

प्रश्न ५ - प्रायश्चित्त किसे कहते हैं ?
उत्तर - जिससे पाप कट कर आत्मा शुद्ध बने ।

प्रश्न ६ - शल्य कितने हैं ?
उत्तर - तीन हैं - १. माया, २. निदान और ३. मिथ्यादर्शन ।

प्रश्न ७ - आगार किसे कहते हैं ?
उत्तर - प्रत्याख्यान में रहने वाली मर्यादा में छूट को आगार
कहते हैं।

प्रश्न ८ - कायोत्सर्ग विषयक कितने आगार हैं ?
उत्तर - कायोत्सर्ग विषयक मुख्य १२ आगार हैं - 
१. ऊससिएणं, २. णीससिएणं, ३. खासिएणं, ४. छीएणं, ५. जंभाइएणं, ६. उड्डुएणं, ७. वायनिसग्गेणं, ८. भमलीए, ९. पित्तमुच्छाए, १०. सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं, ११. सुहुमेहिं खेलसंचालेहिं, १२. सुहुमेहिं दिट्ठिसंचालेहिं ।



आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।