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आलोचना सूत्र [इरियावहियं ( इच्छाकारेणं ) का पाठ ]
प्रश्नोत्तर
प्रश्न १ - आलोचना सूत्र (इच्छाकारेणं) का पाठ क्यों बोला जाता है ? इसे आलोचना सूत्र क्यों कहते हैं ?
उत्तर - योगों (मन वचन काया) की चंचलता, प्रमाद (असावधानी) आदि के कारण आने जाने आदि की क्रिया करते हुए जिन जीवों की विराधना हो जाती है, उन सब की आलोचना (चिन्तन) करने के लिये यह पाठ बोला जाता है । इसलिये इसे आलोचना सूत्र कहते हैं।
प्रश्न २ - आलोचना सूत्र को "इच्छाकारेणं" क्यों कहते हैं ?
उत्तर - पाठ के पहले शब्द से उसका नामकरण करने की भी विधि मिलती है । इस पाठ का पहला शब्द इच्छाकारेणं होने से इसे इच्छाकारेणं का पाठ भी कहते हैं ।
प्रश्न ३ - विराधना किसे कहते हैं ?
उत्तर - व्रत को दूषित करने वाली प्रवृत्ति को विराधना कहते हैं । विधि के अनुसार आचरण नहीं करना विराधना है । जीवों को किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुँचाना भी विराधना है ।
प्रश्न ४ - "इच्छाकारेणं " में चलने से होने वाली क्रिया की ही आलोचना क्यों की गई?
उत्तर - जैसे "रोटी खाई " इस वाक्य में रोटी का प्रयोग करने पर भी शाक दाल चावल आदि सभी सम्मिलित हैं । इसी प्रकार उपलक्षण से अन्य सभी क्रियाओं की आलोचना समझनी चाहिये।
प्रश्न ५ - जीव विराधना कितने प्रकार से हो सकती हैं?
उत्तर - जीवों की विराधना दस प्रकार से हो सकती हैं -
१. अभिहया, २. वत्तिया, ३. लेसिया, ४ संघाइया, ५. संघट्टिया, ६. परियाविया, ७. किलामिया, ८. उद्दविया, ९. ठाणाओ ठाणं संकामिया, १० जीवियाओ ववरोविया ।
प्रश्न ६ - जीव विराधना न हो, इसका उपाय क्या है ?
उत्तर - यतना पूर्वक प्रवृत्ति करना ।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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