जय जिनेन्द्र ,
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आलोचना सूत्र [इरियावहियं ( इच्छाकारेणं ) का पाठ ]

भावार्थ - शिष्य कहता है कि हे गुरु महाराज ! आप इच्छापूर्वक आज्ञा दीजिये कि मैं ईर्यापथिकी क्रिया का प्रतिक्रमण करूँ । गुरु की अनुमति पाने पर शिष्य कहता है कि आपकी आज्ञा प्रमाण है । मैं ईर्यापथिकी क्रिया का प्रतिक्रमण करना चाहता हूँ अर्थात् मार्ग में चलने से हुई विराधना से निवृत्त होना चाहता हूँ। मार्ग में जाते-आते किसी प्राणी को दबाया हो, सचित्त बीज तथा हरी वनस्पति को कुचला हो, ओस, कीड़ी नगरा, पाँच वर्ण की लीलन फूलन, सचित्त जल, सचित्त मिट्टी और मकड़ी के जालों को रौंदा (कुचला) हो । मैंने किन्हीं जीवों की हिंसा की हो जैसे-एक इन्द्रिय वाले-पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और वनस्पति; दो इन्द्रिय वाले-शंख, सीप, गंडोल, लट आदि; तीन इन्द्रिय वाले कुंथुआ,  जूूँ, लीख, कीड़ी, खटमल, चींचड आदि; चार इन्द्रिय वाले-मक्खी, मच्छर, भंवरा, बिच्छू, टिड्डी, पतंगिया आदि; पाँच इन्द्रिय वाले-मनुष्य, तिर्यंच-जलचर, स्थलचर और खेचर आदि । सम्मुख आते हुए उन्हें मारा हो, धूल आदि से ढका हो, पृथ्वी पर या आपस में रगड़ा हो, इकट्ठे करके इन्हें दु:ख पहुँचाया हो तथा छू कर पीड़ा दी हो, क्लेश पहुँचाया हो, मृत तुल्य (मरने सरीखा) किया हो, इनका जीवन नष्ट किया हो, तो इससे होने वाला मेरा पाप निष्फल हो अर्थात् जाने-अनजाने विराधना से कषाय द्वारा मैंने जो पाप कर्म बाँधा है उसके लिये मैं हृदय से पश्चात्ताप करता हूँ जिससे निर्मल परिणाम द्वारा पापकर्म शिथिल हो जावे और मुझे उसका तीव्र फल भोगना न पड़े ।


प्रश्नोत्तर
प्रश्न १ - आलोचना सूत्र (इच्छाकारेणं) का पाठ क्यों बोला जाता है ? इसे आलोचना सूत्र क्यों कहते हैं ?
उत्तर - योगों (मन वचन काया) की चंचलता, प्रमाद (असावधानी) आदि के कारण आने जाने आदि की क्रिया करते हुए जिन जीवों की विराधना हो जाती है, उन सब की आलोचना (चिन्तन) करने के लिये यह पाठ बोला जाता है । इसलिये इसे आलोचना सूत्र कहते हैं।

प्रश्न २ - आलोचना सूत्र को "इच्छाकारेणं" क्यों कहते हैं ?
उत्तर - पाठ के पहले शब्द से उसका नामकरण करने की भी विधि मिलती है । इस पाठ का पहला शब्द इच्छाकारेणं होने से इसे इच्छाकारेणं का पाठ भी कहते हैं ।

प्रश्न ३ - विराधना किसे कहते हैं ?
उत्तर - व्रत को दूषित करने वाली प्रवृत्ति को विराधना कहते हैं । विधि के अनुसार आचरण नहीं करना विराधना है । जीवों को किसी भी प्रकार की पीड़ा पहुँचाना भी विराधना है ।

प्रश्न ४ - "इच्छाकारेणं " में चलने से होने वाली क्रिया की ही आलोचना क्यों की गई?
उत्तर - जैसे "रोटी खाई " इस वाक्य में रोटी का प्रयोग करने पर भी शाक दाल चावल आदि सभी सम्मिलित हैं । इसी प्रकार उपलक्षण से अन्य सभी क्रियाओं की आलोचना समझनी चाहिये

प्रश्न ५ - जीव विराधना कितने प्रकार से हो सकती हैं? 
उत्तर - जीवों की विराधना दस प्रकार से हो सकती हैं -
१. अभिहया, २. वत्तिया, ३. लेसिया, ४ संघाइया, ५. संघट्टिया, ६. परियाविया, ७. किलामिया, ८. उद्दविया, ९. ठाणाओ ठाणं संकामिया, १० जीवियाओ ववरोविया ।

प्रश्न ६ - जीव विराधना न हो, इसका उपाय क्या है ?
उत्तर - यतना पूर्वक प्रवृत्ति करना ।


आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।