जय जिनेन्द्र ,
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७. चतुर्विंशतिस्तव सूत्र (लोगस्स का पाठ)

(अनुष्टुप् वृत्त)

लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे ।
अरहंते➕ कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ॥ १ ॥
        (आर्या वृत्त)
उसभमजियं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमइं च ।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ॥२॥
सुविहिं च पुप्फदंतं, सीयलसिज्जंस-वासुपुज्जं च ।
विमल - मणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ॥३॥
कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।
वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ॥४॥
एवं मए अभित्थुआ🌸 विहुयरयमला पहीणजरमरणा ।
चउवीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ॥५॥
कित्तियवंदिय महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा
आरूग्गबोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ॥ ६॥
चंदेसु णिम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा ।
सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ॥ ७॥ 
                             (हरिभद्रीयावश्यक पृष्ठ ४९३-५०९)
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पाठान्तर- ➕ अरिहंते  , 🌸 अभिथुआ


मूल - अर्थ
लोगस्स - लोक में
उज्जोयगरे - उद्योत-प्रकाश करने वाले
धम्मतित्थयरे - धर्मरूपी तीर्थ को स्थापित करने वाले
जिणे - रागद्वेष को जीतने वाले
अरहंते - अर्हन्त
चउवीसं पि - चौबीस ही
केवली - केवलज्ञानी तीर्थंकरों की
कित्तइस्सं - मैं स्तुति करूँगा
उसभं - श्री ऋषभदेवस्वामी को
च - और
अजियं - श्री अजितनाथ को
वंदे - वन्दना करता हूँ।
संभवं - श्री संभवनाथ को
अभिणंदणं - श्री अभिनन्दन स्वामी को
सुमइं - श्री सुमतिनाथ को
पउमप्पहं - श्री पद्मप्रभ स्वामी को
सुपासं - श्री सुपार्श्वनाथ को
चंदप्पहं - श्री चन्द्रप्रभ स्वामी को
जिणं - जिनेश्वर को
वंदे - वन्दना करता हूँ
सुविहिं - श्री सुविधिनाथ को
पुप्फदंतं - श्री पुष्पदंत (सुविधिनाथ का दूसर नाम) स्वामी को
सीयल - श्री शीतलनाथ को
सिज्जंस - श्री श्रेयांसनाथ को
वासुपुज्जं - श्री वासुपूज्यस्वामी को
विमलं - श्री विमलनाथ को
अणंतं - श्री अनन्तनाथ को
जिणं - जिन (रागद्वेष को जीतने वाले )
धर्म - श्री धर्मनाथ को
संतिं - श्री शान्तिनाथ को
वंदामि - वन्दना करता हूँ
कुंथुं - श्री कुन्थुनाथ को
अरं - श्री अरनाथ को
मल्लिं - श्री मल्लिनाथ को
वंदे - वन्दना करता हूँ
मुणिसुव्वयं - श्री मुनिसुव्रत स्वामी को
नमिजिणं - श्री नमिनाथ जिनेश्वर को
रिट्ठनेमिं - श्री अरिष्टनेमि (श्री नेमिनाथ) स्वामी को
पासं - श्री पार्श्वनाथ को
तह - तथा
वद्धमाणं - श्री वर्द्धमान (महावीर) स्वामी को
वंदामि - मैं वन्दना करता हूँ
एवं - इस प्रकार
मए - मेरे द्वारा
अभित्थुआ - स्तुति किये हुए
विहुयरयमला - पाप रज के मल से रहित
पहीणजरमरणा - जरा (बुढापा) तथा मरण से मुक्त
तित्थयरा - तीर्थ की स्थापना करने वाले
चउवीसं पि - चौबीसों 
जिणवरा - जिनेश्वर देव
मे - मुझ पर
पसीयंतु - प्रसन्न हों
कित्तिय - वाणी से कीर्तन किये हुए
वंदिय - काया से वन्दना किये हुए
महिया - मन से पूजन किये हुए
जे - जो
लोगस्स - लोक में
सिद्धा - सिद्ध भगवान हैं
ए - वे
आरुग्गबोहिलाभं - आरोग्य अर्थात् मोक्ष के लिये सम्यक्तव का लाभ और
समाहिवरमुत्तमं - सर्वोत्कृष्ट भाव समाधि को
दिंतु - देवें
चंदेसु - चन्द्रमाओं से भी
णिम्मलयरा - विशेष निर्मल
आइच्चेसु - सूर्यों से भी 
अहियं - अधिक
पयासयरा - प्रकाश करने वाले
सागरवरगंभीरा - महासमुद्र के समान गम्भीर
सिद्धा - सिद्ध भगवान्
मम - मुझ को
सिद्धिं - सिद्धि (मोक्ष)
दिसंतु - देवें


आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।