जय जिनेन्द्र ,
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४. गुरु वन्दन सूत्र (तिक्खुत्तो का पाठ) 

तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि, वंदामि, णमंसामि, सक्कारेमि, सम्माणेमि, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, चेइयं, पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि 💠 । 
                                     (राजप्रश्नीय सूत्र ८) 
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💠 राजप्रश्नीय सूत्र में 'मत्थएण वंदामि' यह पाठ नहीं हैं, किन्तु परम्परा की धारणा और प्रचलित परिपाटी के अनुसार यह पाठ यहाँ दिया गया है ।


मूल - अर्थ
तिक्खुत्तो - तीन बार
आयाहिणं - दक्षिण ओर से
पयाहिणं - प्रदक्षिणा
करेमि - करता हूँ
वंदामि - गुणग्राम (स्तुति) करता हूँ 
णमंसामि - नमस्कार करता हूँ 
सक्कारेमि - सत्कार करता हूँ  
सम्माणेमि - सम्मान देता हूँ 
कल्लाणं - कल्याण रूप
मंगलं - मंगल रूप
देवयं - धर्मदेव रूप
चेइयं - ज्ञानवंत अथवा सुप्रशस्त मन के हेतु रूप★ की 
पज्जुवासामि - पर्युपासना (सेवा) करता हूँ
मत्थएण - मस्तक नमा कर
वंदामि - वन्दना करता हूँ 
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★ चैत्यं सुप्रशस्तमनोहेतुत्वात् (राजप्रश्नीय सूत्र ६ टीका पृष्ठ १७ आगमोदय समिति ।)


              भावार्थ - हे पूज्य ! दोनों हाथ जोड़ कर दाहिनी ओर से तीन बार प्रदक्षिणा करता हूँ। आपका गुणग्राम (स्तुति) करता हूँ। पंचांग (दो हाथ, दो घुटने और एक मस्तक-ये पाँच अंग) नमा कर नमस्कार करता हूँ। आपका सत्कार करता हूँ। आप को सम्मान देता हूँ। आप कल्याण रूप हैं, मंगलरूप हैं, आप धर्म देव स्वरूप हैं, ज्ञानवन्त हैं अथवा मन को प्रशस्त बनाने वाले हैं। ऐसे आप गुरु महाराज की पर्युपासना (सेवा) करता हूँ और मस्तक नमा कर आपको वन्दना करता हूँ।


आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।