जय जिनेन्द्र ,
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गुरु वन्दन सूत्र ( तिक्खुत्तो का पाठ )
प्रश्नोत्तर

प्रश्न १ - आदक्षिण-प्रदक्षिणा किसे कहते हैं ?
उत्तर - दोनों हाथों को जोड़ कर अपने दायें कान से ऊपर की तरफ ले जाते हुए बायें कान की ओर ले जाना, इस तरह मस्तक के चौतरफ घुमाना, आदक्षिण-प्रदक्षिणा (आवर्तन ) कहलाता है ।

प्रश्न २ - आदक्षिण-प्रदक्षिणा तीन बार क्यों की जाती है?
उत्तर - मन, वचन और काया से वन्दनीय की पर्युपासन करने के लिये तीन बार आदक्षिण-प्रदक्षिणा की जाती है।

प्रश्न ३ - वन्दना तीन बार क्यों की जाती है?
उत्तर - वन्दनीय में रहे हुए ज्ञान, दर्शन और चारित्र इन तीन गुणों की प्राप्ति के लिये वन्दना तीन बार की जाती है ।

प्रश्न ४ - सत्कार किसे कहते हैं ?
उत्तर - अर्हंत (अरिहंत) आदि की स्तुति करना, उनका स्वागत करना उन्हें वस्त्र-पात्र आदि देना सत्कार कहलाता है।

प्रश्न ५ - सम्मान किसे कहते हैं ?
उत्तर - अर्हंत (अरिहंत) आदि को बड़ा मानना, उन्हें ऊँचा आसन देना, हृदय में उनके प्रति भक्तिभाव और बहुमान होना, सम्मान कहलाता है ।

प्रश्न ६ - पर्युपासना कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर - तीन प्रकार की हैं- 
१. नम्र आसन से सुनने की इच्छा सहित वन्दनीय के सम्मुख हाथ जोड़कर बैठना-कायिक पर्युपासना है । 
२. उनके उपदेश के वचनों का वाणी द्वारा सत्कार करते हुए समर्थन करना-वाचिक पर्युपासना है और 
३. उपदेश के प्रति अनुराग रखते हुए एकाग्र चित्त रखना मानसिक पर्युपासना है।

प्रश्न ७ - पर्युपासना से क्या लाभ है?
उत्तर - शुद्ध चारित्र पालने वाले श्रमण-निर्ग्रंथों की पर्युपासना करने से अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है और महान् पुण्यों का उपार्जन होता है।

प्रश्न ८ - पंचांग कौन-कौन से हैं ?
उत्तर - दो घुटने, दो हाथ और मस्तक ।

प्रश्न ९ - वन्दना कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर - वन्दना तीन प्रकार की होती हैं-
१. सामान्य (जघन्य) २. मध्यम और ३. उत्कृष्ट ।

प्रश्न १० - सामान्य (जघन्य ) वन्दना कौन-सी है ?
उत्तर - "मत्थएण वंदामि" कहते हुए हाथ जोड़कर झुकना सामान्य (जघन्य) वन्दना है, क्योंकि यह संक्षिप्त वन्दना है। 

प्रश्न ११ - मध्यम वन्दना कौन-सी है ?
उत्तर - गुरुवन्दन (तिक्खुत्तो) के पाठ से वन्दना करना मध्यम वन्दना है।

प्रश्न १२ - उत्कृष्ट वन्दना कौन-सी है?
उत्तर - "इच्छामि खमासमणो" के पाठ से वन्दना करना उत्कृष्ट वन्दना कहलाती है । यह मात्र उभयकाल प्रतिक्रमण में ही की जाती है।

प्रश्न १३ - संत सतियों के पास जाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिये?
उत्तर - सन्त सतियों के पास जाते समय मुख्य पाँच बातों का ध्यान रखना चाहियेे -
सचित्त त्याग अचित्त रख, उत्तरासंग कर जोड़ ।
कर एकाग्र चित्त को, सब झंझट को छोड़ ॥
१. सचित्त त्याग - सन्त सतियों के पास जाते समय फल, फूल, बीज, शाक आदि सचित्त वनस्पति, कच्चा पानी, नमक, सेल की घड़ी आदि साथ में नहीं ले जाना ।
२. अचित्त विवेक - दर्प (अभिमान) सूचक वस्तुएँ जैसे - छत्र, चामर, जूते, शस्त्र, वाहन आदि एक तरफ रख कर तथा अपने कपड़े आदि को व्यवस्थित करके गुरुजनों को वंदन करने जाना।
३. उत्तरासंग - मुँहपत्ति अथवा मुँहपत्ति सरीखा ही कोई अन्य वस्त्र (जिससे पूर्ण यतना हो सके) मुँह पर रख कर ही बोलना चाहिये । गुरुजनों के सामने खुले मुँह नहीं बोलना चाहिये । इसलिये यतना के लिये कोई उपयुक्त साधन मुख पर अवश्य रखना। 
४. अंजलिकरण - जहाँ से गुरुजन दिखलाई दें, वहीं से अंजलि (दोनों हाथ जोड़) करके विनय करना । 
५. मन की एकाग्रता - संसार के सब प्रपंच और पाप कार्यों से मन हटा कर गुरुजन जो फरमाते हैं उस तरफ चित्त की एकाग्रता रख कर सुनना। 
        ‌इन पांच अभिगमों (साधु-साध्वियों के पास जाते समय ध्यान रखने योग्य बातों ) का पालन सभी को करना चाहिये । जहाँ महासतियाँजी म. सा. या बहिनों की उपस्थिति हो, वहाँ भाई सामायिक के लिये वस्त्र उतारते या पहनते समय उपयोग रखें (छाती पेट आदि उघाड़े न हों ) । बहिनें झीणे कपड़े पहन कर नहीं आवें तथा गुरुजन व्याख्यान आदि दे रहे हों, किसी को पढ़ा रहे हों , बाहर गोचरी आदि पधार रहे हों उस समय में उनके कार्यों में बाधा न पड़े उस प्रकार से जघन्य (संक्षिप्त) वन्दना या दूर से ही वन्दना करने का ध्यान रखना चाहिये।

 प्रश्न १४ "सचित त्याग" आदि को आगम की भाषा में क्या कहते हैं?
उत्तर - "सचित्त त्याग" आदि पाँच बातों का वर्णन भगवती सूत्र शतक २ (2) उद्देशक ५ (5), औपपातिक सूत्र आदि आगमों में हैं । वहाँ इन्हें 'अभिगम' कहा गया है ।


आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।