जय जिनेन्द्र ,
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३. गुरु गुण स्मरण सूत्र
(आर्या वृत्त)

पंचिंदियसंवरणो, तह णवविहबंभचेरगुत्तिधरो ।

चउव्विह कसायमुक्को, इअ अट्ठारसगुणेहिं संजुत्तो ॥१

पंचमहव्वयजुत्तो, पंच विहायारपालणसमत्थो ।

पंचसमिओ तिगुत्तो, छत्तीस गुणो गुरु मज्झ ॥२॥ 
                                     (आवश्यक सूत्र )



मूल - अर्थ
पंचिंदिय - पाँच इन्द्रियों को
संवरणो - वश में करने वाले 
तह - तथा
णवविहबंभचेर - नव प्रकार के ब्रह्मचर्य की
गुत्तिधरो - गुप्तियों को धारण करने वाले
चउव्विह - चार प्रकार के
कसायमुक्को - कषाय से मुक्त
इअ - इन
अट्ठारस गुणेहिं - अठारह गुणों से
संजुत्तो - संयुक्त, सहित
पंचमहव्वयजुत्तो - पाँच महाव्रतों से युक्त
पंचविहायार - पाँच प्रकार का आचार
पालण समत्थो - पालने में समर्थ
पंच-समिओ - पाँच समिति वाले
तिगुत्तो - तीन गुप्ति वाले
छत्तीस-गुणो - (इस प्रकार) छत्तीस गुणों वाले साधु
मज्झ - मेरे 
गुरु - गुरु हैं ।


       भावार्थ - पाँच इन्द्रियों के विषय विकारों को रोकने वाले, ब्रह्मचर्य व्रत की नौ प्रकार की गुप्तियों को-नौ वाड़ों को धारण करने वाले, क्रोध आदि चार प्रकार के कषायों से मुक्त, इस प्रकार अठारह गुणों से संयुक्त ॥१॥
       अहिंसा आदि पाँच महाव्रतों से युक्त, पाँच आचार के पालन करने में समर्थ, पाँच समिति और तीन गुप्ति के धारण करने वाले अर्थात् उक्त छत्तीस गुणों वाले श्रेष्ठ साधु मेरे गुरु हैं ॥२॥
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प्रश्नोत्तर

प्रश्न १. - गुरु गुण स्मरण का पाठ क्यों बोलना चाहिये?
उत्तर - धर्म का सही स्वरूप समझाने वाले गुरु होते हैं। वे गुरु छत्तीस गुणों के धारक होते हैं। गुरु के गुणों का स्मरण करने से हममें भी उन गुणों की प्राप्ति होती है। अत: गुरु गुण स्मरण का पाठ बोलना चाहिये।


आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर  ।