जय जिनेन्द्र ,
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५. आलोचना सूत्र
[इरियावहियं ( इच्छाकारेणं ) का पाठ ]

इच्छाकारेणं संदिसह भगवं । इरियावहियं पडिक्कमामि ? इच्छं, इच्छामि 🌸 पडिक्कमिउं, . इरियावहियाए विराहणाए, गमणागमणे, पाणक्कमणे, बीयक्कमणे, हरियक्कमणे, ओसा-उत्तिंग-पणग-दग-मट्टी-मक्कडासंताणा संकमणे, जे मे जीवा विराहिया, एगिंदिया, बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिंदिया, पंचिंदिया, अभिहया, वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया, उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया तस्स मिच्छामि दुक्कडं॥ 
                                    (हरिभद्रीयावश्यक पृष्ठ ५७२)
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🌸 'इच्छामि ' से 'मिच्छामि दुक्कडं' तक का पाठ आवश्यक सूत्र में है।


मूल  - अर्थ
भगवं - हे भगवन् ! हे गुरु महाराज !
इच्छाकारेणं - इच्छापूर्वक
संदिसह - आज्ञा दीजिये (कि मैं )
इरियावहियं - ईर्यापथिकी क्रिया का (चलने आदि से लगने वाली क्रिया का) 
पडिक्कमामि - प्रतिक्रमण करूँ
 (गुरुजनों की ओर से आज्ञा मिल जाने पर या अपने संकल्प से ही आज्ञा स्वीकार करके साधक कहता है-)
इच्छं - आपकी आज्ञा प्रमाण है
इच्छामि - इच्छा करता हूँ 
पडिक्कमिउं - प्रतिक्रमण करने की
इरियावहियाए - मार्ग में चलने से होने वाली  
विराहणाए - विराधना से
(विराधना किस तरह होती है ?) 
गमणागमणे - जाने आने में 
पाणक्कमणे - किसी प्राणी को दबाया हो
बीयक्कमणे - बीज को दबाया हो
हरियक्कमणे - हरी वनस्पति को दबाया हो
ओसा -  ओस
उत्तिंग - कीड़ी नगरा
पणग - पाँच रंग की काई (लीलन फूलन)
दग - कच्चा पानी
मट्टी - सचित्त मिट्टी (और)
मक्कडासंताणा -  मकड़ी के जालों को
संकमणे - कुचला हो
मे - मैंने
एगिंदिया - एक इन्द्रिय वाले
बेइंदिया - दो इन्द्रिय वाले
तेइंदिया - तीन इन्द्रिय वाले 
चउरिंदिया - चार इन्द्रिय वाले
पंचिंदिया - पाँच इन्द्रिय वाले
जे -  जो
जीवा - जीव हैं (उन्हें)
विराहिया - पीड़ित किये हों (विराधना की हो)
           (किस तरह पीड़ित किये हों ?) 
अभिहया - सम्मुख आते हुए को हना हो
वत्तिया - धूल आदि से ढँका हो
लेसिया - मसला हो 
संघाइया - इकट्ठा किया हो
संघट्टिया - संघट्टा (छूआ) किया हो 
परियाविया - परिताप (कष्ट) पहुँचाया हो
किलामिया -  किलामना उपजाई हो, मृततुल्य किया हो
उद्दविया -  उद्वेग उपजाया हो या भयभीत किया हो
ठाणाओ - एक स्थान से
ठाणं - दूसरे स्थान पर
संकामिया -  रखा हो
जीवियाओ -  जीवन से 
ववरोविया -  रहित किया हो
तस्स -  उसका
दुक्कडं - पाप
मि - मेरा
मिच्छा -  मिथ्या (निष्फल) हो ।



आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही । इस सूत्र / पाठ का भावार्थ एवं प्रश्नोत्तर अगले ब्लॉग में बताया जाएगा ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।