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७. चतुर्विंशतिस्तव सूत्र (लोगस्स का पाठ)
भावार्थ - (तीर्थंकर की स्तुति ) ऊर्ध्वलोक, अधोलोक और तिरछालोक इन तीनों लोकों में धर्म का उद्योग करने वाले, धर्म की स्थापना करने वाले और रागद्वेष आदि अन्तरंग शत्रुओं पर विजय पाने वाले चौबीसों केवलज्ञानी तीर्थंकरों की मैं स्तुति करूँगा ।
सर्व श्री ऋषभदेवजी, अजितनाथजी, संभवनाथजी, अभिनन्दनजी, सुमतिनाथजी, पद्मप्रभजी, सुपार्श्वनाथजी, चन्द्रप्रभजी, सुविधिनाथजी, शीतलनाथजी, श्रेयांसनाथजी, वासुपूज्यजी, विमलनाथजी, अनन्तनाथजी, धर्मनाथजी, शान्तिनाथजी, कुन्थुनाथजी, अरनाथजी, मल्लिनाथजी, मुनिसुव्रतजी, नमिनाथजी, अरिष्टनेमिजी (नेमिनाथ जी), पार्श्वनाथजी और महावीर स्वामी जी । इन चौबीस जिनेश्वरों की मैं स्तुति करता हूँ और इन्हें नमस्कार करता हूँ।
उपरोक्त प्रकार से मैनें जिनकी स्तुति की हैं, जो कर्म - मल से रहित हैं, जो जरा और मरण से मुक्त हैं और तीर्थ प्रवर्तक हैं, वे चौबीसों जिनेश्वर मुझ पर प्रसन्न होवें। जिनका वाणी से कीर्तन, काया से वन्दन और मन से भाव-पूजन किया गया है, जो सम्पूर्ण लोक में उत्तम हैं और जो सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त हुए हैं, वे भगवान् मुझ को मोक्ष प्राप्ति के लिये बोधि-लाभ दें अर्थात् जिन-धर्म की प्राप्ति करावें तथा सर्वोत्कृष्ट भाव- समाधि प्रदान करें ।
जो चन्द्रमाओं से भी विशेष निर्मल हैं, सूर्यों से विशेष प्रकाशमान हैं और स्वयंभूरमण नामक महासमुद्र के समान गम्भीर हैं, ऐसे सिद्ध भगवान् मुझ को सिद्धि (मोक्ष) देवें।
यद्यपि राग -द्वेष रहित होने से भगवान् न किसी पर प्रसन्न होते हैं, न कुछ देते ही हैं, पर उनका ध्यान करने से चित्त शुद्धि द्वारा अभिलषित फल की प्राप्ति होती है । जिस प्रकार चिंतामणि रत्न से -जड़ होने पर भी-वांछित फल की प्राप्ति होती है ।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न १ - चतुर्विंशतिस्तव सूत्र का दूसरा नाम क्या है ?
उत्तर - इस पाठ का दूसरा नाम 'लोगस्स का पाठ' है ।
प्रश्न २ - इसे चतुर्विंशतिस्तव सूत्र क्यों कहा जाता है ?
उत्तर - इसमें चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति की गई है । इसलिये इसे चतुर्विंशतिस्तव सूत्र कहा जाता है ।
प्रश्न ३-क्या तीर्थंकर किसी पर प्रसन्न होते हैं ?
उत्तर - नहीं, क्योंकि वे राग - द्वेष रहित हैं।
प्रश्न ४-तब 'तीर्थंकर मुझ पर प्रसन्न हों ' - ऐसी प्रार्थना क्यों की जाती है ?
उत्तर - इसलिये कि ऐसी प्रार्थना से हममें मोक्ष प्राप्ति की योग्यता आती है । हममें योग्यता आना ही 'तीर्थंकरों को प्रसन्न होना ' कहा गया है।
प्रश्न ५ - तीर्थंकर मोक्ष पधार गये हैं और अब उपदेश नहीं देते हैं, तब ऐसी प्रार्थना क्यों की जाय?
उत्तर - इसलिये कि जो मोक्ष पधार गये हैं, उनके गुण हममें भी प्रकट हों । ऐसी प्रार्थना से उनका उपदेश धारण करने की हमारी भावना दृढ़ बनती है और उससे हम भी मोक्ष के निकट होते हैं । सम्यग्दर्शन की विशुद्धि होती है । जीवों का प्रीतिपात्र और पूजनीय बनते हैं।
प्रश्न ६ - कीर्तन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर - वाणी से स्तुति करना ।
प्रश्न ७ - वंदन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर - शरीर से पंचांग झुका कर नमस्कार करना ।
प्रश्न ८ - पूजन से क्या आशय है ?
उत्तर - अपने हृदय को समर्पित करना ।
प्रश्न ९-कीर्तन एवं वन्दन से क्या लाभ है ?
उत्तर - १. कीर्तन एवं वन्दन करने से हमारा ज्ञान बढ़ता है २. श्रद्धा बढ़ती है ३. नये पाप कर्म नहीं बंधते हैं ४ पुण्य का बंध होता है ५. पुराने पाप क्षय होते हैं।
प्रश्न १० तीर्थंकर चन्द्रमाओं से भी अधिक निर्मल कैसे हैं ?
उत्तर - चन्द्रमाओं में कुछ कलंक दिखाई देते हैं, परन्तु तीर्थंकर में चार घनघाति रूप कर्म-कलंक नहीं होता है । इसलिये वे चन्द्रमाओं से भी अधिक निर्मल हैं ।
प्रश्न ११ - तीर्थंकर सूर्यों से भी अधिक प्रकाश कैसे करते हैं ?
उत्तर - सूर्य सीमित क्षेत्र को प्रकाशित करते हैं परंतु तीर्थंकर अपने केवलज्ञान से समस्त द्रव्यों, क्षेत्रों, काल और भावों को प्रकाशित करते हैं । इसलिये तीर्थंकर को सूर्यों से भी अधिक प्रकाश करने वाले कहा गया है ।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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