२.सम्यक्त्व सूत्र
(आर्या वृत्त)
अरहंतो🌼 मह देवो, जावज्जीवाए🏵️ सुसाहुणो गुरुणो।
जिणपण्णत्तं तत्तं, इअ सम्मत्तं मए गहियं॥ १ ॥
(आवश्यक सूत्र)
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पाठान्तर-🌼 अरिहंतो 🏵️ जावज्जीवं
मूल - अर्थ
अरहंतो - अर्हंत भगवान्
मह - मेरे
देवो - देव ☀️ हैं
जावज्जीवाए - यावज्जीवन (जब तक जीवन है)
सुसाहुणो - श्रेष्ठ साधु
गुरुणो - गुरु हैं
जिणपण्णत्तं - वीतराग देव द्वारा प्ररूपित (कहा हुआ)
तत्तं - तत्त्व (धर्म) है
इअ - यह
सम्मत्तं - सम्यक्त्व
मए - मैंने
गहियं - ग्रहण किया है।
भावार्थ - रागद्वेष को जीतने वाले अर्हंत भगवान् मेरे देव हैं, जीवन पर्यन्त संयम की साधना करने वाले सच्चे साधु मेरे गुरु हैं, श्री जिनेश्वर देव का बताया हुआ अहिंसा सत्य आदि ही मेरा धर्म है-यह देव गुरु धर्म पर श्रद्धा स्वरूप सम्यक्त्व व्रत मैंने यावज्जीवन के लिये ग्रहण किया है ।
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☀️ यहाँ देव शब्द का अर्थ ईश्वर -परमात्मा है ।
प्रश्नोत्तर
प्रश्न १ - सम्यक्त्व किसे कहते हैं ?
उत्तर - देव अर्हंत (अरिहंत), गुरु निर्ग्रंथ और केवली प्ररूपित धर्म इन तीन तत्वों पर दृढ़ श्रद्धा होना सम्यक्त्व कहलाता है।
प्रश्न २ - अर्हंत (अरिहंत) ही देव क्यों हैं ?
उत्तर - अर्हंत ही रागद्वेष रहित, पूर्णज्ञानी, सभी जीवों का हित चाहने वाले और संसार सागर से तिराने वाले होते हैं । अन्य किसी में भी ये गुण नहीं पाये जाते हैं । अतः अर्हंत ही देव कहलाते हैं ।
प्रश्न ३- सुसाधु ही गुरु क्यों हैं ?
उत्तर - जो भगवान् की आज्ञा के अनुसार शुद्ध संयम का पालन करते हैं वे सुसाधु कहलाते हैं । ऐसे सुसाधु ही हमें धर्म का शुद्ध मार्ग बता सकते हैं । इसलिये सुसाधु ही गुरु कहलाते हैं।
प्रश्न ४ - जिन प्ररूपित तत्त्व ही धर्म क्यों हैं ?
उत्तर - जिन-रागद्वेष रहित पूर्णज्ञानी अर्हंत देव (तीर्थंकर) द्वारा बताया हुआ जीवादि नव पदार्थ का स्वरूप ही धर्म कहलाता है । ऐसा धर्म ही सभी दुःखों से छुटकारा दिला कर मोक्ष तक पहुंचाता है।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर

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