जय जिनेन्द्र ,
एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है ।
आज हम इस ब्लॉग में आवश्यक सूत्र जो कि 32 वा आगम है तथा जो सबसे छोटा आगम है लेकिन इसका काम सबसे बड़ा माना गया है और यह सबसे पहले याद किया जाता है । इसलिए हम शुरुआत आवश्यक सूत्र से करेंगे । मैं भी आपसे यह चाहूंगा कि आप भी सभी सूत्रों को याद साथ-साथ करते जाएं क्योंकि यह आपको आगे आने वाले भव / जन्म को सुधारने में काम आएंगे तथा आपको मोक्ष के नजदीक लेकर जाएंगे। तो आइए शुरू करते हैं ।
आवश्यक सूत्र
।। श्री वीतरागाय नमः॥
सामायिक सूत्र सार्थ
१. नमस्कार सूत्र
(आर्या वृत्त)
णमो अरहंताणं💠 , णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं ।
णमो उवज्झायाणं , णमो लोए सव्वसाहूणं ॥ १ ॥
एसो पंच णमोक्कारो☀️ , सव्व पावप्पणासणो ।
मंगलाणं च सव्वेसिं , पढमं हवइ मंगलं ॥ २ ॥
(भगवती सूत्र मंगलाचरण तथा आवश्यक सूत्र)
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पाठान्तर- 💠अरिहंताणं ,☀️ णमुक्कारो
मूल शब्द - अर्थ
अरहंताणं - अर्हन्तों (अरिहन्तों) को
णमो - नमस्कार हो
सिद्धाणं - सिद्धों को
णमो - नमस्कार हो
आयरियाणं - आचार्यों को
णमो - नमस्कार हो
उवज्झायाणं - उपाध्यायों को
णमो - नमस्कार हो
लोए - लोक में
सव्वसाहूणं - सभी साधुओं को
णमो - नमस्कार हो
एसो - यह
पंच णमोक्कारो - पाँच परमेष्ठियों को किया हुआ नमस्कार
सव्वपावप्पणासणो - सभी पापों का नाश करने वाला है
च - और
सव्वेसिं - सभी
मंगलाणं - मंगलों में
पढमं - प्रथम (प्रधान)
मंगलं - मंगल
हवइ - है ।
भावार्थ - श्री अर्हन्त (अरिहन्त) भगवान्, श्री सिद्ध भगवान्, श्री आचार्य महाराज, श्री उपाध्याय महाराज और लोक में वर्तमान सभी साधु मुनिराज-इन पाँच परमेष्ठियों को मेरा नमस्कार हो । उक्त पाँच परमेष्ठियों को किया हुआ नमस्कार सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला है और सभी प्रकार के लौकिक और लोकोत्तर मंगलों में प्रधान मंगल है ।
नमस्कार सूत्र प्रश्नोत्तर
प्रश्न १ - नमस्कार किसे कहते हैं ?
उत्तर - दोनों हाथों को जोड़ कर ललाट पर लगाते हुए मस्तक झुकाना ।
प्रश्न २ - अर्हन्त (अरिहन्त) किसे कहते हैं ?
उत्तर - जो देवों द्वारा बनाये हुए आठ महाप्रातिहार्य (अशोक वृक्ष आदि) रूप पूजा के योग्य हैं तथा वन्दन नमस्कार एवं सत्कार के योग्य हैं, सर्वज्ञ सर्वदर्शी हैं, चार तीर्थ की स्थापना करने वाले हैं और जो सिद्धिगमन के योग्य हैं उनको अर्हंत (अर्हत्) कहते हैं अथवा अरि-आत्मशत्रुओं को (चार घातिकर्मों को) हंत-नाश करने वालों को 'अरिहन्त' कहते हैं ।
प्रश्न ३-चार घातीकर्म कौन से हैं ?
उत्तर - १. ज्ञानावरणीय २. दर्शनावरणीय ३. मोहनीय और
४.अन्तराय ।
प्रश्न ४ सिद्ध किसे कहते हैं ?
उत्तर - जिन्होंने आठों कर्मों को क्षय करके आत्मकल्याण साध लिया है, उन्हें सिद्ध कहते हैं ।
प्रश्न ५ - आचार्य किसे कहते हैं ?
उत्तर - चतुर्विध संघ के नायक, जो स्वयं पाँच आचार पालते हैं और चतुर्विध संघ से भी पलवाते हैं, उन्हें आचार्य कहते हैं।
प्रश्न ६-पाँच आचार कौन-कौन से हैं ?
उत्तर - ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार-ये पाँच आचार हैं ।
प्रश्न ७ - उपाध्याय किसे कहते हैं?
उत्तर - जो साधु शास्त्रज्ञ हैं और दूसरों को शास्त्र पढ़ाते हैं, उन्हें उपाध्याय कहते हैं ।
प्रश्न ८ - साधु किसे कहते हैं ?
उत्तर - जो पाँच महाव्रत और पाँच समिति तथा तीन गुप्ति का पालन करते हैं और अपने आत्मकल्याण की साधना करते हैं, उन्हें साधु कहते हैं ।
प्रश्न ९ नमस्कार सूत्र में किन को नमस्कार किया गया है ?
उत्तर - पाँच पदों को नमस्कार किया गया है ।
प्रश्न १० - पद किसे कहते हैं ?
उत्तर - योग्यता से प्राप्त हुए (पूज्य) स्थान को पद कहते हैं।
प्रश्न ११ - नमस्कार करने से क्या लाभ होता है ?
उत्तर - सभी पापों का नाश होता है, विनयशीलता बढ़ती है और नम्रता आती है।
प्रश्न १२-मंगल किसे कहते हैं ?
उत्तर - जो पापों को गलावे-नाश करे तथा जो आनंद और कल्याण देवे, उसे मंगल कहते हैं 🌸।
प्रश्न १३ - नमस्कार-सूत्र का दूसरा नाम क्या है ?
उत्तर - पंच परमेष्ठी सूत्र ।
प्रश्न १४ - नमस्कार सूत्र या पंच परमेष्ठी सूत्र को नवकार मंत्र या पंच परमेष्ठी मंत्र क्यों नहीं कहना चाहिए?
उत्तर - अक्सर मंत्र भौतिक कामनाओं की पूर्ति करने वाले होते हैं व इनकी रचना सामान्य व्यक्तियों के द्वारा होती है ।णमोक्कार का पाठ आगम का पाठ है, यह सर्व प्रकार के संतापों का नाश करके मोक्ष प्राप्त कराने में सहायक है । आगम के पाठ को मंत्र कहना उसकी गरिमा कम करना है, जैसे बी. ए. पास को दसवीं पास कहना उसकी गरिमा कम करना है, बी. ए. पास कहने से दसवीं पास तो अपने आप स्पष्ट हो ही जाता है, इसी प्रकार सूत्र में मंत्र की विशेषतायें तो अपने आप निहित हैं । अतः मंत्र न कहकर सूत्र ही कहना चाहिये ।
प्रश्न १५ - परमेष्ठी किसे कहते हैं ?
उत्तर - परम अर्थात् उत्कृष्ट स्थान । लोक में उत्कृष्ट स्थान दो हैं-मोक्ष और संयम । जो मोक्ष और संयम में स्थित हैं, उन्हें परमेष्ठी 🌼 कहते हैं ।
प्रश्न१६ - पाँच पदों में से कितने पद मोक्ष में और कितने पद संयम में स्थित हैं ?
उत्तर - सिद्ध भगवान मोक्ष में स्थित हैं । शेष चार पद अर्हंत (अरिहंत), आचार्य, उपाध्याय और साधु ये चार पद संयम में स्थित है।
प्रश्न१७ - क्या सिद्ध भगवान संयम में स्थित नहीं हैं ?
उत्तर - भूतकाल में सिद्ध भगवान भी संयम में स्थित थे अर्थात् उन्होंने भी संयम-चारित्र का पालन किया था । किन्तु अब वे मोक्ष में स्थित हैं । संयम-चारित्र का प्रयोजन है कर्मों का क्षय करना । सिद्धों ने आठों कर्मों का क्षय कर दिया है इसलिये अब मोक्ष में चारित्र का कोई प्रयोजन नहीं हैं।
प्रश्न १८ - नमस्कार सूत्र में पहले सिद्धों को नमस्कार करना चाहिये, क्योंकि वे मोक्ष में चले गये हैं, तब अर्हंतों (अरिहंतों) को पहले नमस्कार क्यों किया गया है ?
उत्तर - अर्हंत (अरिहंत) वर्तमान में धर्म की प्ररूपणा करते हैं, इसलिये वे हमारे लिये अधिक उपकारी हैं । सिद्ध निराकार हैं,
वे दिखाई भी नहीं देते हैं । उनकी पहिचान भी अर्हंत करवाते हैं। अत: पहले अर्हन्तों को नमस्कार किया गया है।
प्रश्न १९ - पाँच पदों में से देव कितने व गुरु कितने हैं ?
उत्तर - अर्हंत और सिद्ध, ये दो देव और शेष तीन पद गुरु
के हैं।
प्रश्न २० - पंच परमेष्ठी में कितने गुण होते हैं ?
उत्तर - परंपरा से अर्हंत में १२ (12), सिद्ध में ८ (8), आचार्य में ३६ (36), उपाध्याय में २५ (25) और साधु में २७ (27), कुल १०८ (108) गुण बताये जाते हैं।
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🌸 मं-पापं, गालयति-नाशयति इति मङ्गलम् । अथवा मङ्गं-आनन्दं कल्याणं लाति-ददाति इति मङ्गलम् ।
🌼परमेष्ठी शब्द की व्युत्पत्ति (अर्थ) संस्कृत में इस प्रकार है -
"परमे-उत्कृष्ट स्थाने-मोक्षे संयमे वा तिष्ठति इति परमेष्ठी ।"
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
पूरा ब्लॉग पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । अगर आपको यह ब्लॉग अच्छा लगा हो तो नीचे comment में हमें जरूर बताएं ।आप हमें FOLLOW एवं E-MAIL द्वारा सब्सक्राइब भी कर सकते हैं ताकि आपके पास यह ज्ञान निरंतर आता रहे।
जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर

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