जय जिनेन्द्र ,

एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है । 
आज हम इस ब्लॉग में आवश्यक सूत्र जो कि 32 वा आगम है तथा जो सबसे छोटा आगम है लेकिन इसका काम सबसे बड़ा माना गया है और यह सबसे पहले याद किया जाता है । इसलिए हम शुरुआत आवश्यक सूत्र से करेंगे । मैं भी आपसे यह चाहूंगा कि आप भी सभी सूत्रों को याद साथ-साथ करते जाएं क्योंकि यह आपको आगे आने वाले भव / जन्म को सुधारने में काम आएंगे तथा आपको मोक्ष के नजदीक लेकर जाएंगे। तो आइए शुरू करते हैं ।

आवश्यक सूत्र
प्रारंभिक प्रश्नोत्तर

प्र. १- प्रतिक्रमण किसे कहते हैं ?
उ.   - पापों से पीछे हटना, पापों की आलोचना करना, अशुभ योग से शुभ योग में आना और व्रतों में लगे अतिचारों से लौटकर आचार में आना प्रतिक्रमण है ।

प्र. २- प्रतिक्रमण का दूसरा नाम क्या है?
उ.   - प्रतिक्रमण सूत्र का दूसरा नाम आवश्यक सूत्र है ।

प्र. ३- आवश्यक सूत्र किसे कहते हैं ?
उ.   - जो सूत्र चतुर्विध संघ के लिये सबसे पहले जानना और उभयकाल करना आवश्यक होता है, उसे आवश्यक सूत्र कहते हैं। 

प्र. ४- आवश्यक सूत्र के कितने अध्ययन हैं ?
उ.   - आवश्यक सूत्र के छह अध्ययन हैं :-
(१) सामायिक (२) चतुर्विंशतिस्तव (३) वन्दना (४) प्रतिक्रमण (५) कायोत्सर्ग (६) प्रत्याख्यान ।
 
प्र. ५- आवश्यक सूत्र के इन छह अध्ययनों का (भेदों का) क्रम इस प्रकार क्यों रखा गया है ?
उ.   - आलोचना प्रारंभ करने के पूर्व आत्मा में समभाव की प्राप्ति होना आवश्यक है अत: सावद्य योग के त्याग रूप पहला सामायिक आवश्यक बताया गया है । सावद्य योगों से विरति रूप मोक्षमार्ग का उपदेश तीर्थकर प्रभु ने दिया है अत: उनकी स्तुति रूप दूसरा चतुर्विंशतिस्तव आवश्यक है इससे दर्शन विशुद्धि होती है । तीर्थंकरों द्वारा बताये हुए धर्म को गुरु महाराज ने हमें बताया है अतः उनको समर्पित होकर आलोचना करने के लिए तीसरा वन्दन आवश्यक बताया गया है । ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप में जो अतिचार लगते हैं उनकी बुद्धि के लिए पश्चात्ताप रूप चौथा प्रतिक्रमण आवश्यक है । आलोचना करने के बाद अतिचार रूप घाव पर प्रायश्चित्त रूप मरहम पट्टी करने के लिए पांचवां कायोत्सर्ग आवश्यक कहा गया है । कायोत्सर्ग करने के बाद तप रूप नये गुणों को धारण करने के लिए छठा प्रत्याख्यान आवश्यक बताया गया है । 

प्र. ६- ये आवश्यक कब किये जाते हैं ?

उ.   - नियमित रूप से सूर्यास्त के पश्चात् तथा प्रात:काल सूर्योदय के पहले तक उभय काल, ये छहों आवश्यक करने की भगवान् की आज्ञा है।

प्र. ७- नित्य उभयकाल आवश्यक करने से क्या लाभ हैं ?
उ.   - (१) सामायिक आदि आवश्यकों का ज्ञान होता है । 
(२) ये आवश्यक अवश्य करणीय हैं । 
(३) किये गये व्रतों की स्मृति रहती है । 
(४) व्रत ग्रहण न किये हों तो ग्रहण करने की भावना बनती है।
(५) देवगुरु का स्मरण हो जाता है 
(६) सम्यक्त्वादि में लगे अतिचारों की शुद्धि होती है । 
(७) नित्य आवश्यक करने से दूसरों को भी उसका महत्व समझ में आता है । 
(८) इससे जीव कर्मों की कोटि खपाता है और उत्कृष्ट रसायन (भाव) आवे तो तीर्थंकर नाम कर्म उपार्जन करता है।

प्र. ८- सूत्र किसे कहते हैं ?
उ.   - भगवान् की वाणी को गणधरों और बहुश्रुतों (१० पूर्वधर
आदि) ने अपने शब्दों में जो रचना की है, उन्हें सूत्र कहते है ।

प्र. ९- आवश्यक सूत्र को 'प्रतिक्रमण-सूत्र' क्यों कहा गया है ?
उ.   - आवश्यक सूत्र के छह अध्ययनों में चौथा आवश्यक (अध्ययन) सबसे बड़ा है और उसका नाम प्रतिक्रमण है अतः उसके नाम से ही सूत्र का यह नाम प्रचलित है ।

प्र. १०- प्रतिक्रमण के कितने प्रकार हैं ?
उ.   - काल की अपेक्षा प्रतिक्रमण के निम्न पांच भेद किये गये हैं :-
(१) दैवसिक - प्रतिदिन सायंकाल - सूर्यास्त के बाद दिन भर के पापों की आलोचना करना । 
(२) रात्रि - रात्रि के अन्त में - प्रात:काल के समय रात्रि के पापों की आलोचना करना । 
(३) पाक्षिक - महीने में दो बार - पाक्षिक पर्व के दिन १५ दिन में लगे हुए पापों की आलोचना करना । 
(४) चातुर्मासिक - कार्तिक पूर्णिमा, फाल्गुन पूर्णिमा और आषाढ़ी पूर्णिमा को चार महीने में लगे हुए पापों की आलोचना करना। 
(५) सांवत्सरिक - प्रत्येक वर्ष भाद्रपद शुक्ला पंचमी संवत्सरी के दिन वर्ष भर के पापों की आलोचना करना ।

प्र. ११- प्रतिक्रमण किसका किया जाता है ?
उ.   - (१) मिथ्यात्व (२) अव्रत (३) प्रमाद (४) कषाय और (५) अशुभ योग का प्रतिक्रमण किया जाता है। 

प्र. १२- मिथ्यात्व किसे कहते हैं ?
उ.   - कुदेव, कुगुरु और कुधर्म पर श्रद्धा रखना मिथ्यात्व है।

प्र. १३- अव्रत किसे कहते हैं ?
उ.   - एकांश या सर्वांश में प्रत्याख्यान न करना अव्रत है।

प्र. १४- प्रमाद किसे कहते हैं ?
उ.   - धर्म कार्य में आलस्य करना, असावधान रहना, निर्धारित समय पर धर्म कार्य न करना और इन्द्रियों के विषयों में आसक्त रहना। 

प्र. १५- कषाय किसे कहते हैं ?
उ.   - 'कष' अर्थात् संसार, 'आय' अर्थात् प्राप्ति अथवा जिससे संसार में परिभ्रमण करना पड़े, उसे कषाय कहते हैं । क्रोध, मान, माया और लोभ, ये चार कषाय हैं ।

प्र. १६- अशुभ योग किसे कहते हैं ?
उ.   - मन, वचन और काया की अशुभ प्रवृत्ति को अशुभ योग कहते हैं।

प्र. १७- जिसने व्रत धारण नहीं किये हैं उसके लिए क्या प्रतिक्रमण करना आवश्यक है ?
उ.   - जिसने व्रत धारण नहीं किये हैं उसको भी प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए । क्योंकि आवश्यक सूत्र बत्तीसवां आगम बताया गया है । आगम का स्वाध्याय आत्मकल्याण तथा निर्जरा का कारण है तथा प्रतिक्रमण एक ऐसी औषधि के समान है जिसका प्रतिदिन सेवन करने से विद्यमान रोग शान्त हो जाते हैं, रोग नहीं होने पर उस औषधि के प्रभाव से वर्ण, रूप, यौवन और लावण्य आदि में वृद्धि होती है और भविष्य में रोग नहीं होते । इसी तरह यदि दोष लगे हों तो प्रतिक्रमण द्वारा उनकी शुद्धि हो जाती है और दोष नहीं लगा हो तो प्रतिक्रमण भाव और चारित्र की विशेष शुद्धि करता है । इसलिए प्रतिक्रमण सभी के लिए समान रूप से आवश्यक है।

प्र. १८- प्रतिदिन उभयकाल प्रतिक्रमण करने से दैवसिक और रात्रिक अतिचारों की शुद्धि प्रतिदिन हो जाती है । फिर ये पाक्षिक आदि प्रतिक्रमण क्यों किये जाते हैं ?
उ.   - जिस प्रकार अपने घरों में प्रतिदिन सफाई की जाती है फिर भी त्यौहार (होली, दीवाली आदि) एवं विशेष अवसरों पर विशेष रूप से सफाई की जाती है । इसी प्रकार प्रतिदिन उभयकाल प्रतिक्रमण करते हुए भी पर्व दिनों में आत्मा की विशेष शुद्धि के लिए पाक्षिक, चौमासी आदि प्रतिक्रमण किये जाते हैं।

प्र. १९- प्रतिक्रमण करने से क्या आत्मशुद्धि (पाप का धुलना) हो जाती है?
उ.   - प्रतिक्रमण में दैनिक आदि चर्या का अवलोकन किया जाता है। आत्मा में हुए आस्रवद्वार (अतिचारादि) रूप छिद्रों को देखकर रोक दिया जाता है । जिस प्रकार कपड़े पर कीचड़ आदि लगने पर उसे धोने से शुद्ध हो जाता है । उसी प्रकार आत्मा पर लगे अतिचारादि रूप मलिनता को पश्चात्ताप आदि के द्वारा साफ किया जाता है । व्यवहार में भी अपराध को सरलता से स्वीकार करने पर, पश्चात्ताप आदि करने पर अपराध हल्का हो जाता है । जैसे "माफ कीजिए (सॉरी)" आदि कहने पर माफ कर दिया जाता है। उसी प्रकार अतिचारों की निन्दा करने से पश्चात्ताप करने से आत्म शुद्धि (पाप का धुलना) हो जाती है ।

आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।

अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म । 

पूरा ब्लॉग पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । अगर आपको यह ब्लॉग अच्छा लगा हो तो नीचे comment में हमें जरूर बताएं ।आप हमें FOLLOW एवं E-MAIL द्वारा सब्सक्राइब भी कर सकते हैं ताकि आपके पास यह ज्ञान निरंतर आता रहे।
 
जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर