जय जिनेन्द्र ,
एक बार फिर से आप सबका इस ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है । जैसे मैंने अपने पिछले ब्लॉग में बताया था कि इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि बारह उपांग को पढ़कर हमें उस आगमो से क्या सीखने को मिलेगा अर्थात उसमें क्या-क्या जानकारी दी गई है।
आज हम 12 से 23 आगमो में क्या सिखने को मिलता है यह पता लगाएंगे । इन आगमो को बारह उपांग सूत्र भी कहते है जैसा मैने पीछले ब्लॉग में बताया था । तो आयिए शुरू करते हैं ।
12) औपपातिक [उ (ओ )ववाइय ] = इस आगम में नगर , उद्यान , राजा , साधु एवं साधु की लब्धियो का वर्णन किया गया है ।
13) राजप्रश्नीय (रायपसेणियं ) = इस आगम में राजापरदेशी का वर्णन किया गया है ।
14) जीवाभिगम (जीवाभिगमो ) = इस अगम में जीव-अजीव के बारे में पूर्ण रूप से बताया गया है तथा सृष्टि का वर्णन किया गया है ।
15) प्रज्ञापना (पण्णवणा ) = इस आगम में सृष्टि के सर्जन के बारे में बताया गया है ।
16) जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति ( जम्बूद्दीवपण्णात्ती ) = इस आगम में हमें जैन जगत के भूगोल के बारे में जानने को मिलता है ।
17) चन्द्रप्रज्ञप्ति (चंदपण्णत्ती ) = इस आगम में हमें जैन जगत की तिथि तोरण के बारे में पता चलता है । इस आगम का अर्थ पढ़ा नहीं जाता है ।
18) सूर्यप्रज्ञप्ति (सूरपण्णत्ती ) = इस आगम में ऋतु परिवर्तन के बारे में बताया गया है तथा इसका भी अर्थ पढ़ा नहीं जाता है ।
19) निरयावलिका (णिरयावलियाओ कप्पियाओ ) = इस आगम में नरक में जाने वालो का वर्णन बताया गया है ।
20) कल्पावतंसिका (कप्पवडंसियाओ ) = इस आगम में राजवंश देवलोक में उत्पन्न होने वालों का वर्णन है ।
21) पुष्पिका (पुप्फियाओ ) = इस आगम में बहुपुत्रिका एवं चंद्रदेव का भगवान के चरणों में आने का वर्णन है ।
22) पुष्पचूलिका (पुप्फचूलियाओ ) = इस आगम में भगवान पार्श्वनाथ की विराधक साध्वी पुष्पचूलिका का वर्णन है ।
23) वृष्णिदशा (वण्हीदसाओ ) = इस आगम में हरिवंश कुल की शिक्षा कथा दि गयी है ।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगले ब्लॉग में हम जानेंगे कि 24 से 32 आगमो को पढ़कर हमें उस आगमो से क्या सीखने को मिलेगा अर्थात उसमें क्या-क्या जानकारी दी गई है।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
पूरा ब्लॉग पढ़ने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद । अगर आपको यह ब्लॉग अच्छा लगा हो तो नीचे comment में हमें जरूर बताएं ।आप हमें FOLLOW एवं E-MAIL द्वारा सब्सक्राइब भी कर सकते हैं ताकि आपके पास यह ज्ञान निरंतर आता रहे।
जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर
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