जय जिनेन्द्र ,
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सात व्यसन
जिन कुटेवों - बुरी आदतों के कारण मनुष्य का पतन होता है, सदाचार एवं धर्म से विमुख होता है, जिन कारणों से मनुष्य का विश्वास नष्ट होता है, जो सज्जनों के लिए त्याज्य है और जिन दुराचारों से मनुष्य जन्म बिगड़ कर नरकादि दुर्गति का पात्र बनता है, उन कुटेवों को व्यसन कहते हैं । व्यसन सात हैं। प्रत्येक व्यक्ति को निम्न सात व्यसनों का त्याग अवश्य करना चाहिए। जिससे जीवन निर्मल और पवित्र बनता है, जीवन में सर्वांगीण विकास की संभावना बनती है तथा व्यक्ति अनेक खतरों से बच जाता है।
दोहा -
द्यूतञ्च मांसं च सुरा च वेश्या, पापर्द्धिचौर्यं परदार सेवा ।
एतानि सप्त व्यसनानि लोके घोरातिघोरं नरकं नयन्ति ॥
१. जुआ - ताशपत्ती, चौपड़, शतरंज आदि के माध्यम से पैसे लगाकर खेलना, सट्टा करना आदि ।
२. मांस - मांस, मछली, अण्डे खाना जहाँ शाकाहारी, मांसाहारी भोजन की सामूहिक व्यवस्था हों वहाँ खाना-पीना व ठहरना । फाइवस्टार, थ्रीस्टार होटल में भोजन करना, ठहरना आदि।
३. मद्य - शराब, गांजा, चरस, भांग, अफीम, बीड़ी, सिगरेट, जरदे (तम्बाखू) का गुटका, स्मेक, हेरोइन आदि नशीली वस्तुओं का सेवन करना ।
४. वेश्यागमन - वेश्या के घर जाना तथा उसके साथ कुशील का सेवन करना । केबरें, ब्रेकडांस देखना आदि ।
५. शिकार - शस्त्र, गिलोल आदि से सिंह, मृग, खरगोश, चिड़ियाँ, मछलियाँ, कबूतर आदि पशु पक्षियों को क्रीड़ा-कौतुक के लिए मारना।
६. चोरी - सेंध आदि लगाकर, जेब आदि काटकर, रास्ते में लूटकर या और किसी अन्य उपाय से किसी का धन हरण करना ।
७. परस्त्रीगमन - अपनी विवाहित स्त्री के सिवाय अन्य स्त्री के साथ कुशील का सेवन करना ।
उपरोक्त सात व्यसन में लुब्ध मनुष्य, नरकादि दुर्गति में जाता है।
आज के लिए इस ब्लॉग में इतना ही ।
अगर भगवान की आज्ञा के विरूद्ध कुछ भी कहा हो तो मिच्छामी दुकड़म ।
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जय जिनेन्द्र ,
जय महावीर ।

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